Thursday, October 27, 2011

... वजह कुछ तो होगी, आशिकी की !

फेसबुक भी, मतलबियों की बस्ती है 'उदय'
सच ! बहुत अपनी वाल से बाहर नहीं आते !
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जूते उठाने के हुनर ने उसे मंत्री बना दिया
अब उसे जन भावनाओं की परवा नहीं है !
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कम से कम आज तो नसीबों की बातें न हों
सुनते हैं, पत्थर भी पूजे गए हैं !
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कुछ लोग लिखते तो बहुत धांसू हैं
अफ़सोस ! छपते नहीं हैं !!
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आज उसे रंज हुआ है, मुझसे बिछड़ कर
सच ! कल तक तो वो बड़े घमंड में थे !!
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मैंने उनके नाम, ढेरों पैगाम लिख छोड़े थे
उन्हें फुर्सत कहाँ थी, जो उन्हें पढ़ भी लेते !
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सच ! कमबख्त ये क्या मुहब्बत है
वो होती तो है, पर होती नहीं है !!!
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जी तो चाहता था, मुहब्बत कर लें हम
पर, उनकी हाँ पर भी हम खामोश रहे !
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जिन पे फना होने को, हम आतुर हुए थे
कहाँ थी खबर कि वो भी हम पे फना हैं !
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उम्मीद तो नहीं थी 'उदय' वफ़ा की
वजह कुछ तो होगी, आशिकी की !

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