Tuesday, September 13, 2011

... दफ्न कर के भी दोस्त घवराए हुए हैं !

सच ! कहीं ऐसा न हो, स्वर्ण मूर्तियाँ सहेज ली जाएँ
और पत्थर की मूर्तियाँ शोध के लिए छोड़ दी जाएँ !
...

आज उनके क़त्ल का इल्जाम, हम पे लग गया यारो
सच ! जिनसे बच-बुचा कर हम खुद जीते रहे थे !
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जिनके वादों से मौत का ये मुकाम है आया
तो वो, और ही उनका पैगाम है आया !
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सच ! किसी को खूब, बहुत खूब भाने लगे हैं हम
सुना है कुर्बानी के बकरे नजर आने लगे हैं हम !
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आज हमने एक फरेबी से हाँथ मिला लिया है
उफ़ ! करते भी क्या, कोई चारा नहीं था !!
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सबा होकर, फना होकर, मुहब्बत में हम 'खुदा' हो गए
कल तक थे सभी के, आज खुद से भी जुदा हो गए !
...
उफ़ ! आज हमने उन्हें ही सलाम ठोक दिया
जो शिखर पे पहुंचते ही गूंगे-बहरे हुए थे !
...
कोई बे-वजह हमसे मुंह फेर के बैठा था
हमें प्यार था तो, पर किसी और से था !
...
खौफ में इस कदर कदम डगमगाए हुए हैं
मुझे दफ्न कर के भी दोस्त घवराए हुए हैं !
...
न मुहब्बत का सुरूर, न माशूक की बेरहमी थी जेहन में
'उदय' जाने, बिना आशिक हुए, हम कैसे शायर हो गए !

3 comments:

Unknown said...

बहुत बढ़िया रचना |

मेरी नई रचना देखें-
**मेरी कविता:राष्ट्रभाषा हिंदी**

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

3, 4 और 9वां बहुत बढ़िया लगे...

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत खूब।