Sunday, December 12, 2010

क्यों मैं बसता हूँ इर्द-गिर्द तेरे, चंद लब्जों में कैसे बयां कर दूं !

कायर साथियों के हिम्मत की दाद तो देनी होगी
डरते भी हैं, और खंजर-नश्तर साथ
भी रखते हैं !
....................
चले जाना मुझे तुम छोड़कर यूं
पर यादों में सफ़र लंबा लिखा है !
....................
कब तक बदलेंगी सोखियाँ देखें
हम चेहरे पे नजरें, टिकाये बैठे हैं !

....................
तुमको चहरे पे गुमां है शायद
पर हम नज़रों पे यकीं रखते हैं !
....................
तू हंसकर जब खफा होती है
कसम 'उदय' की सबसे जुदा होती है !
....................
क्यों मैं बसता हूँ इर्द-गिर्द तेरे, चंद लब्जों में कैसे बयां कर दूं
साथ जन्मों जन्मों का है, एक पल में कैसे खुदको जुदा कर लूं !

14 comments:

किलर झपाटा said...

बहुत अच्छे अच्छे शेर कहे उदय जी।
वाह वाह कैसे बयाँ कर दूं ? करेक्ट।

Arvind Jangid said...

बेहतरीन शेर! सुन्दर रचना, आपका साधुवाद.

मनोज कुमार said...

तुमको चहरे पे गुमां है शायद
पर हम नज़रों पे यकीं रखते हैं !
गहरे अर्थों वाले शे’र की प्रस्तुति।

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही तेज़ शेर हैं, तीखे भी।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

तुमको चहरे पे गुमां है शायद
पर हम नज़रों पे यकीं रखते हैं !
वाह..

दिगम्बर नासवा said...

तू हंसकर जब खफा होती है
कसम 'उदय' की सबसे जुदा होती है ..

वाह .. क्या ग़ज़ब का शेर है उदय जी ... लाजवाब ...

डॉ. मोनिका शर्मा said...

कायर साथियों के हिम्मत की दाद तो देनी होगी
डरते भी हैं, और खंजर-नश्तर साथ भी रखते हैं
बेहतरीन शेर...

arvind said...

teekhe par bahut achhe sher.

vandan gupta said...

गज़ब के शेर हैं।

रचना दीक्षित said...

लाज़वाब हर एक शेर दिल पर दस्तक दे गया

Sushil Bakliwal said...

डरते भी हैं, और खंजर-नश्तर साथ भी रखते हैं !
डरते हैं तभी तो खंजर साथ रखते हैं । बेहतरीन...

डॉ टी एस दराल said...

क्यों मैं बसता हूँ इर्द-गिर्द तेरे, चंद लब्जों में कैसे बयां कर दूं
साथ जन्मों जन्मों का है, एक पल में कैसे खुदको जुदा कर लूं !

बहुत सुन्दर अलफ़ाज़ ।

संजय भास्‍कर said...

शेर ग़ज़ब का है......... उदय जी

ZEAL said...

बहुत सटीक एवं उम्दा प्रस्तुति।