Thursday, November 25, 2010

गूंगे-बहरे-अंधे ...

तीन खड़े हैं, तीन बढे हैं
तीन कर रहे मौज हैं यारा !

कौन कह रहा, कौन सुन रहा
एक गूंगा, एक बहरा है !

गूंगा भी खामोश खडा है
और बहरा भी ताक रहा है !

और एक खडा मौन हुआ है
वो तो बिलकुल अंधा है !

गूंगे-बहरों-अंधों ने मिलकर
देश का बेडागर्क किया है !

कुछ तो जय जय कार हो रहे
और कुछ जय जय कार कर रहे !

देश के तीनों बन्दर देखो
मौज-मजे में चूर हो रहे !

बहरा हाथ में लाठी लेकर
जनता को फटकार रहा है !

और गूंगे की मौज हुई है
वो सत्ता में चूर हुआ है !

अब अंधों की क्या बोलें हम
गूंगे-बहरों को खूब मजे से हांक रहे हैं !

गूंगे-बहरे-अंधे मिलकर
देश का बेडागर्क कर रहे !

है कोई जो अब इन तीनों को
जंजीरों में बाँध सके, वरना !

वरना अब क्या बोलें हम
लोकतंत्र है, लोकतंत्र है !!!

32 comments:

Randhir Singh Suman said...

nice

Sushil Bakliwal said...

उत्तम, अति उत्तम.

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

बहुत बढ़िया रचना ... अब गूंगो बहरों का ही देश हो गया है ...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

गूंगों-बहरों पर राज इनके अलावा कर भी कौन सकता है...

Rahul Singh said...

कहने, सुनने, देखने वालों के आगे आने की जरूरत हर युग में रही है और वही कमान भी संभालते हैं.

Deepak Saini said...

लोकतंत्र पर अच्छा कटाक्ष
गुंगे, अंधे और बहरे ही ये देश चला रहे है।

ज्ञानचंद मर्मज्ञ said...

व्यवथा पर करारा व्यंग्य !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

करारा व्यंग ....जनता रुपी बन्दर अब कुछ चेत रहा है

vandan gupta said...

बेहतरीन व्यंग्य्।

जय हिन्द said...

बेहतरीन, करारा, उत्तम, अति उत्तम, कटाक्ष !

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar said...

सुन्दर चित्रण किया है आपने...अब आता रहूँगा यहाँ भी!

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar said...

०विज्ञप्ति०
लेखकगण कृपया ध्यान दें-
देश की चर्चित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक त्रैमासिक पत्रिका ‘सरस्वती सुमन’ का आगामी एक अंक ‘मुक्‍तक विशेषांक’ होगा जिसके अतिथि संपादक होंगे सुपरिचित कवि जितेन्द्र ‘जौहर’। उक्‍त विशेषांक हेतु आपके विविधवर्णी (सामाजिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक, धार्मिक, शैक्षिक, देशभक्ति, पर्व-त्योहार, पर्यावरण, श्रृंगार, हास्य-व्यंग्य, आदि अन्यानेक विषयों/ भावों) पर केन्द्रित मुक्‍तक/रुबाई/कत्अ एवं तद्‌विषयक सारगर्भित एवं तथ्यपूर्ण आलेख सादर आमंत्रित हैं।

इस संग्रह का हिस्सा बनने के लिए न्यूनतम 10-12 और अधिकतम 20-22 मुक्‍तक भेजे जा सकते हैं।

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प्रेषित सामग्री के साथ फोटो एवं परिचय भी संलग्न करें। समस्त सामग्री केवल डाक या कुरियर द्वारा (ई-मेल से नहीं) निम्न पते पर अति शीघ्र भेजें-

जितेन्द्र ‘जौहर’
(अतिथि संपादक ‘सरस्वती सुमन’)
IR-13/6, रेणुसागर,
सोनभद्र (उ.प्र.) 231218.

shikha varshney said...

बेडागर्क होने को अब बचा क्या है ...

arvind said...

अति उत्तम.

Kunwar Kusumesh said...

गूंगे-बहारों-अंधों ने मिलकर
देश का बेड़ागर्ग किया है !

सच कहा आपने ,good

संजय भास्‍कर said...

करारा, उत्तम, अति उत्तम, कटाक्ष !

रचना दीक्षित said...

गूंगे-बहरे-अंधे मिलकर
देश का बेड़ागर्ग कर रहे !
बेडागर्क होने को अब बचा क्या है

गौरव शर्मा "भारतीय" said...

वाह बेहतरीन व्यंग......
बधाई एवं आभार

पूनम श्रीवास्तव said...

uday ji
kya khoob vyangatmak purn rachna ki hai .padh kar maja aa gaya.
पहाड़ों पर नज़र आती है फिर से रूइ की चादर
हवा करती है सरगोशी बदन ये काँप जाता है

फजाओं में महकती है तिरे एहसास की खुशबू
हवा की पालकी में बैठ कर मन गुनगुनाता है
bahut -bahut hi achhi-----
poonam

S.M.Masoom said...

है कोई जो अब इन तीनों को
जंजीरों में बाँध सके, वरना !

वरना अब क्या बोलें हम
लोकतंत्र है, लोकतंत्र है !!!

अति सुंदर

Sunil Kumar said...

व्यवथा पर करारा व्यंग्य !

डॉ. मोनिका शर्मा said...

उत्तम करार व्यंग है आज के हालातों पर.....

M VERMA said...

हालात को सही परखा

लोकतंत्र है, लोकतंत्र है !!!

kshama said...

Goongi,bahari,andhi to janta ho rahi hai! Jantako noch khanewalon ke paas to na jane kitne indreey hain!

प्रवीण पाण्डेय said...

यह बन्दरों का है, मनुष्यों का क्या कार्य।

mridula pradhan said...

sahi chitran.

mridula pradhan said...
This comment has been removed by the author.
संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी इस रचना का लिंक मंगलवार 30 -11-2010
को दिया गया है .
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

प्रभावशाली रचना... आभार. (शुक्रिया चर्चामंच)

अर्चना तिवारी said...

देश के तीनों बन्दर देखो
मौज-मजे में चूर हो रहे ...गूंगे..बहरे...अंधे....बहुत सुंदर व्यंग

अनुपमा पाठक said...

उत्तम व्यंग्य!

वाणी गीत said...

" बुरा मत देखो , बुरा मत सुनो , बुरा मत कहो "
गाँधी जी के सच्चे अनुयायी ...