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Tuesday, May 22, 2018

यही जीवन है .... !

वक्त हमेशा हवा की गति के साथ उड़ते रहता है, दौड़ते रहता है ... उस पर किसी का जोर नहीं है किसी का नियंत्रण नहीं है .... यदि हम उसके साथ कदम मिलाने से जरा भी चुके तो समझो हम खो गए, बिछड़ गए ....

बिछड़ने के बाद हम कहाँ होंगे, कितने पीछे होंगे, किसके साथ होंगे .... ईश्वर जाने ... !

इसलिए .. सदा ... वक्त की रफ्तार को पकड़े रहो, उसे अपनी आंखों से ओझल मत होने दो .... जीवन एक दौड़ है और वक्त साँसें हैं, वक्त कदम हैं, वक्त चाल है ...

जिस प्रकार कभी-कभी हवा रुक जाती है अर्थात सन्नाटे का रूप ले लेती है .. तो ठीक इसके विपरीत कभी-कभी तूफान का रूप भी ले लेती है अर्थात बवंडर बन जाती है ...

सन्नाटे और बवंडर जैसे क्षण अक्सर हमारे जीवन में आते -जाते रहते हैं ... इन क्षणों में हमें संयम से काम लेना है ..

संयम और हमारी एकाग्रता हमें हर सन्नाटे व बवंडर से पार ले जाएंगे .. और ....

वक्त .. एक दिन ... हमें हमारी मंजिल पर छोड़ कर .. हमें सैल्यूट मारते हुए आगे निकल जाएगा .... यही जीवन है ..... !

~ उदय 

Wednesday, March 14, 2012

कर्म ...

"सामान्यतौर पर मनुष्य के जीवन काल में उसके कर्मों के फल तत्कालीन तौर पर लाभप्रद परिलक्षित होते हैं किन्तु जब तक इस रहस्य से पर्दा नहीं उठ जाता कि मनुष्य के कर्म उसके मरने के बाद उसे किस रूप में फल प्रदान करेंगे तब तक यह निश्चय करना बेईमानी होगा कि अच्छे या बुरे कर्मों के दूरगामी परिणाम क्या होंगे ... पर हाँ, बड़े बड़े खंड़हर हो चुके महलों व इमारतों को देखकर ऐंसा अनुमान तो लगाया ही जा सकता है कि उनमें रहने वाले राजाओं, महाराजाओं, सूरमाओं, सुल्तानों की न सिर्फ सल्तनतें व बादशाहतें नष्ट हुई हैं वरन उनकी पीढियां भी स्वाहा हो गई हैं इसलिए इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि यह उनके बुरे कर्मों की परिणिती है ... अत: सदभावनापूर्ण कर्म हमारे जीवन में सोच व व्यवहार के हिस्से होने चाहिये !"

Thursday, January 19, 2012

लेखन एक कला है ...

“लेखन एक कला है ... शब्दों व भावों की रचना, लेख, कहानी, कविता, गजल, हास्य-व्यंग्य, शेर-शायरी, ये सभी समय समय पर की जाने वाली नवीन अभिव्यक्तियाँ होती हैं, अभिव्यक्तियों के भाव-विचार सकारात्मक अथवा नकारात्मक हो सकते हैं, अत: इन अभिव्यक्तियों के आधार पर लेखक की मन: स्थिति का आँकलन करना निरर्थक है !”

Thursday, January 5, 2012

मैं ...

मैं क्या है ? मैं कौन है ? मैं क्यों है ?

सरल शब्दों में कहा जाए तो 'मैं' कुछ और नहीं सिर्फ एक आईना है जो भी शख्स आईने के सामने खडा होगा उसे अपनी ही तस्वीर नजर आयेगी अर्थात 'मैं' सिर्फ 'मैं' नहीं हूँ वरन जो 'मैं' के सामने है वह 'मैं' है !

दूसरे शब्दों में कहा जाए तो 'मैं' एक तस्वीर की आँखें है जब हम तस्वीर को, तस्वीर के किसी भी कोने से खड़े होकर देखते हैं तो यह प्रतीत होता है कि वह हमें ही देख रही है, ठीक इसी प्रकार 'मैं' है, दरअसल 'मैं' उस तस्वीर की आँखें है जिससे हम बच नहीं सकते कि वह हमें नहीं देख रही है !

तात्पर्य यह है कि 'मैं' कोई और नहीं है वरन जो उस 'मैं' के सामने खडा है वह खुद ही 'मैं' है अर्थात हम सभी जब जब 'मैं' के सामने होंगे, उस 'मैं' में हम ही होंगे !

'मैं' कोई अहम नहीं है, घमंड नहीं है, कोई विचारधारा भी नहीं है, सिर्फ एक आईना है, सिर्फ एक प्रतिबिंब है, सिर्फ एक व्यक्तित्व है !!

Monday, December 19, 2011

भारतीय संविधान ...

"भारतीय संविधान प्रत्येक इंसान को स्वर्गरूपी जीवन प्रदान करने के लिए उपयुक्त व पर्याप्त है किन्तु क्रियान्वयन में लचरता व असफलता के परिणाम स्वरूप ज्यादातर लोगों को नारकीय जीवन जीना पड़ रहा है ... अफसोसजनक !"

आपके विचार भिन्न हो सकते हैं, आपके विचारों का स्वागत है ...
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Sunday, December 18, 2011

चाह ...

"चुम्बन, आलिंगन, मिलन, सम्भोग, जैसे छोटे-मोटे व्यवहारिक शब्दों को पढ़कर महिलाएं उद्धेलित जैसी हो जाती है ... पता नहीं, आज के बदलते परिवेश में वे किस आजादी, स्वतंत्रता, समानता की चाह रखती हैं !"

Monday, December 12, 2011

हे ईश्वर ...

हे ईश्वर ! हे अन्तर्यामी ! हे पालनहार !
कब तक -
तू यूँ ही मेरी परीक्षा लेता रहेगा ?
कब तक -
तू यूँ ही मुझे झकझोरते रहेगा ?
कब तक -
तू यूँ ही मुझे हार-जीत में उलझाए रहेगा ?
मुझे मालुम है कि -
मैं तुझसे जीत नहीं सकता हूँ, इसलिए
तू आज से -
मेरी परीक्षा लेना बंद कर दे !
मैं जान गया हूँ कि -
तू मेरे अन्दर ही बैठा हुआ है !
बस इशारा करते चल -
जैसा तू चाहेगा, वैसा मैं करते चलूँगा !!

Friday, July 15, 2011

गुरु की जरुरत क्यों होती है !

एक जिज्ञासु व उत्साही बालक नदी किनारे पीपल पेड़ के पास बनी कुटिया में निवासरत औघड़ बाबा के पास पहुंचा, बाबा जी को प्रणाम करते हुए ...
बालक - बाबा जी मैं आपसे कुछ जानना चाहता हूँ यदि आपका आशीर्वाद हो तो !
बाबा जी - हाँ पूंछो क्या जानना चाहते है वत्स !
बालक - बाबा जी, क्या बिना किसी को गुरु बनाए भी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है !
बाबा जी - हाँ, जरुर ज्ञान प्राप्त किया जा सकता !
बालक - बाबा जी मैं बिना किसी को गुरु बनाए ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ, क्या यह संभव हो सकता है !
बाबा जी - हाँ, जरुर संभव है किन्तु ज्ञान कब व कितने समय में प्राप्त होगा इस बात की कोई समय सीमा निश्चित नहीं होगी !
बालक - क्या यह भी संभव है कि मैं ज्ञान प्राप्ति के लिए जीवन भर भटकता रहूँ और ज्ञान प्राप्त न हो !
बाबा जी - हाँ, यह भी संभव है ... वत्स अब तुम जाओ, मुझे कुछ काम करना है !
बालक - बाबा जी, बस एक सवाल और ... !
बाबा जी - ( बीच में ही टोकते हुए ) वत्स अब तुम जाओ, मुझे कुछ जरुरी काम करने हैं !
बालक - प्लीज बाबा जी, बस एक सवाल !
बाबा जी - हाँ, पूछो !
बालक - गुरु की जरुरत क्यों होती है !
बाबा जी - वत्स, गुरु की जरुरत ... जरुरत इसलिए होती है कि गुरु सदैव ही सही मार्ग बताता है, सांथ ही सांथ गुरु के द्वारा बनाया हुआ मार्ग भी सहजता से शिष्य को प्राप्त हो जाता है, उदाहरण के तौर पर यदि तुम्हें दिल्ली जाना है तब तुम भटकते-भटकाते, पूंछते-ताछते, दिल्ली तो पहुँच जाओगे किन्तु कितना समय लगेगा, कितनी परेशानियों का सामना करना पडेगा यह सुनिश्चित नहीं होगा और यह भी संभव है कि तुम दिल्ली के स्थान पर कहीं और पहुँच जाओ अर्थात दिल्ली पहुँच ही न पाओ ... यदि तुम्हारे पास एक जानकार गुरु होगा तब यह मार्ग तुमको सहजता से सुलभ हो जाएगा, भले ही थोड़ी-बहुत कठिनाइयों का सामना पड़े, थोड़ी देर-सबेर भी हो सकती है, पर तुम पहुंचोगे तो सीधे दिल्ली ही पहुंचोगे !!

गुरुओं का गुरु !

"अक्खड़ बाबा" का एक शिष्य - कृपालु शाम को आश्रम में आते ही बाबा के प्रिय कुत्ते कालू के सामने दो अगरबत्ती जलाकर दो समोसे भेंट स्वरूप चढ़ा कर अपनी कुटिया की ओर जाने लगा ... यह सब देख बाबा जी कृपालु पर भड़क गए - साले, निकम्मे, तुझे मैंने अपना शिष्य बना कर बहुत बड़ी भूल की है जा निकल जा आश्रम से, आज से तू मेरा शिष्य नहीं रहा ... बाबा जी का क्रोध देखकर कृपालु भी सन्न रह गया, अपना बोरिया-बिस्तर समेटते हुए, धीरे से बाबा जी से पूछने लगा - हे प्रभु, मेरा अपराध क्या है जब तक आप मुझे बताएंगे नहीं, मैं पश्चाताप कैसे करूंगा ... निकम्मे, नालायक तुझसे अच्छा तो ये मेरा कालू है जो कम से कम मेरे प्रति बफादार तो है, तेरी हिम्मत कैसे हुई जो आज जैसे महापवित्र दिन पर तूने मेरा अपमान करते हुए कालू को अगरबत्ती व प्रसाद ... प्रभु क्षमा करें, मुझे माफ़ करें, मुझसे न ही कोई गलती हुई है और न ही मैंने आपका कोई अपमान किया है, "कालू" अपने आश्रम का बफादार सेवक व चौकीदार है जो रात-दिन अपनी सेवा में खडा रहता है इस नाते ही मैंने आश्रम में प्रवेश करते ही दया भाव से उसका सम्मान किया है, और आप तो साक्षात मेरे "भगवान" हैं आप मेरे "महागुरु" हैं और आपका पालतु कालू मेरा "छोटा गुरु" है, बस स्नान कर मैं आपकी सेवा में हाजिर होने ही वाला था इतने में ही आप भड़क गए, मैं अपनी इस छोटी सी कार्यशैली के लिए आपसे क्षमा चाहता हूँ कृपया मुझे क्षमा करते हुए मेरी बात सुन लें ... ( अक्खड़ बाबा तनिक नरम होते हुए शांत स्वर में बोले ) ... अच्छा सुना, आज तुझे ही सुन लेते हैं ... प्रभु आप मेरे परम गुरु हैं आपसे ही मैंने सम्पूर्ण शिक्षा ग्रहण की है किन्तु आपसे प्राप्त शिक्षा में मुझे आपके जैसा ही अक्खडपन मिला है, वर्त्तमान समय में इस अक्खड़पन के परिणाम स्वरूप जीवन चलाना कितना मुश्किल है यह आप भी भली-भाँती जानते हैं, पिछले डेढ़-दो माह पहले अपने आश्रम में खाने के लाले पढ़ गए थे तब ही मैंने आपके इस महान कुत्ते "कालू" से कुछ शिक्षा ग्रहण की थी जिसके परिणाम स्वरूप तब से लेकर आज तक अपना आश्रम खुशियों से फला-फूला है ... ( बाबा जी पिघलते हुए) ... ये तू क्या बोल रहा है कृपालु, इतनी बड़ी बात, तूने मुझसे छिपा कर रखी, अपना "कालू" ... हाँ प्रभु, मुझे याद है उन दिनों अपने आश्रम में दो दिनों तक चूला भी नहीं जला था मैं इस पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर आश्रम और आपकी चिंता में डूबा हुआ था ठीक उसी समय दो दिन का भूखा अपना यह महान "कालू" मेरे पास आया और सामने खडा होकर "दुम" हिलाने लगा, बहुत देर तक "दुम" हिलाते रहा, ठीक उसी पल मेरे दिमाग में बिजली सी कौंधी और मुझे उसके "दुम" हिलाने के भाव से "समर्पणभाव" रूपी शिक्षा मिली, शिक्षा ग्रहण करते ही मैं भिक्षा हेतु निकल पडा, वह दिन है कि आज का दिन है हमारे आश्रम में प्रतिदिन नए नए पकवान बनते हैं सिर्फ आप, मैं और कालू ही नहीं वरन आठ-दस नए लोग भी प्रसाद ग्रहण करते हैं यह सब इस महान "कालू" से प्राप्त शिक्षा का प्रतिफल है, यदि फिर भी आपको लगता है मुझसे कोई गलती हुई है तो मैं पुन: आपसे क्षमा मांगता हूँ, मुझे क्षमा करें प्रभु ... ( बातें सुनते सुनते अक्खड़ बाबा भावुक हो गए उनकी आँखें नम सी हो गईं तथा कृपालु को गले लगाते हुए बोले ) ... पुत्र तू महान है, आज तूने यह सिद्ध कर दिया कि शिक्षा किसी से भी ग्रहण की जा सकती है फिर भले वह "कालू" ही क्यों न हो, ये दुनिया तेरे भक्ति भाव को सदैव याद रखेगी, मैं धन्य हुआ तेरे जैसा महान शिष्य पाकर, मेरा आशीर्वाद है कि तू एक दिन "गुरुओं का गुरु" बनेगा !!

Monday, July 11, 2011

मुंडन संस्कार अर्थात एक साये का उठ जाना !

भईय्या प्रणाम ...
आओ अनुज, खुश रहो, कैसे हो !
ठीक हूँ भईय्या, एक बेहद गंभीर सामाजिक व धार्मिक टाईप की समस्या से कल सामना हो गया, मैं भी ज़रा भौंचक रह गया, और क्या जवाब देता यह भी नहीं समझ पाया !
अरे, क्या समस्या आ गई, वो भी तेरे जैसे समझदार आदमी के पास, हमें भी बताओ, क्या समस्या है !
हाँ भईय्या, हुआ दर असल यह कि कल रात मोहल्ले में एक लड़का जिसकी उम्र लगभग १८-१९ साल होगी, गुजर गया अर्थात स्वर्ग सिधार गया ... अब समस्या यहाँ पर ये आई कि उसके घर में छोटी-बड़ी उम्र के अनेक सदस्य हैं, कहने को भतीजा बड़ा है, और तो और पोते भी हो गए हैं ... कहने का मतलब यह है कि उम्र का कोई हिसाब-किताब नहीं है, अब आप तो समझते ही हो कि गाँव-देहात में बच्चे-पे-बच्चे होते रहते हैं, और शादियों -पे-शादियाँ भी ... मतलब रिश्ते में उम्र का छोटा-बड़ा रिश्ता अर्थात उम्र से भी बड़ा कभी कभी रिश्ता निकल आता है ... अब यहाँ पर समस्या यह है कि अग्निदाह संस्कार के बाद कौन कौन "मुंडन" कराएगा तथा कौन कौन नहीं कराएगा ... अर्थात सामाजिक व धार्मिक रीतिरिवाजों के अनुसार "मुंडन" किसको कराना चाहिए और किसको नहीं कराना चाहिए, ये समस्या सामने आ के खड़ी हो गई !
हाँ, सच कहा, समस्या तो है पर उतनी गंभीर नहीं जितनी तुझे लग रही है !
भईय्या सिर्फ मुझे ही नहीं, कल रात को तो गाँव के चबूतरे पर चौपाल लगी थी उसमें यह मुद्दा उठ गया ... पर कोई स्पष्ट समाधान नजर नहीं आया ... इसलिए ही मैं आज सुबह सुबह आपके पास आया हूँ ... अब आपके अलावा गाँव में और है कौन, जिससे समस्या का समाधान ... !
अरे, कोई भी पुराना आदमी बता देगा !
लगभग सभी पुराने, बुजुर्ग तो थे ही, फिर भी "कन्फ्यूजन" बना हुआ था ... अब आप ही बताओ, समाधान !
आ, पास आकर बैठ, और "कान खुजा के बैठ" ... एक ही बात बार बार नहीं बताऊंगा ... बात दर असल यह है कि "मुंडन संस्कार" की परम्परा लम्बे अर्से से चली आ रही है, अब इसके सामाजिक व धार्मिक तौर-तरीके क्या हैं वह तो मैं नहीं जानता, पर जितना सुना और जाना है मैंने, उसके अनुसार ही बता रहा हूँ ... तू मुझसे तर्क-वितर्क के हिसाब से कोई पोथी-पुराण संबंधी तथ्य मत पूंछने बैठ जाना, क्योंकि वह मैं नहीं दे पाऊंगा, वह तो कोई पंडित या शास्त्रों का जानकार ही बता पायेगा ... अगर तू "कान खुजा" के बैठ गया है तो सुन ... किसी भी बात को दोबारा नहीं बताऊंगा !
हाँ भईय्या ... आप बताओ ... कान भी खुजा लिए हैं और आँख भी मींड ली हैं !
बहुत बढ़िया ... तू काफी समझदार हो गया है, कान खुजाने के सांथ सांथ आँखे भी मींड कर बैठ गया है मतलब आँख और कान दोनों खुले रखेगा, शाबास ... तो सुन, सिर के बाल मानव शरीर में "साये" की तरह होते हैं अर्थात सुरक्षा-रक्षा के प्रतीक होते हैं, दूसरी तरह से कह सकते हैं मन, मस्तिष्क, आत्मा, सिर, के ऊपर "साया' के प्रतीक के रूप में होते हैं, सीधे शब्दों में कहूं तो "साया" होते हैं भले रक्षा कर पाएं या नहीं ... ठीक इसी प्रकार सामाजिक व पारिवारिक चलन में "रिश्ते" को "उम्र" से बड़ा माना गया है, फिर भले किसी की "उम्र" कम ही क्यों न हो पर यदि वह "रिश्ते" में बड़ा है तो "बड़ा" ही माना जाएगा ... तात्पर्य यह है कि अगर "चाचा" उम्र में छोटा है और "भतीजा" उम्र में बड़ा है इस स्थिति में "रिश्ते" के हिसाब से "चाचा" ही बड़ा माना जाएगा ... और जो रिश्ते में बड़ा है वह ही बड़ा रहेगा तथा सभी छोटों को उनके सामने झुकना पडेगा अर्थात अदब से पेश आना पडेगा, उनकी आज्ञा का पालन करना पडेगा ... अब हम तेरे सवाल पे आते हैं, किसी भी व्यक्ति के मरने पर उसकी "उम्र" को महत्त्व न देते हुए "रिश्ते" को महत्त्व दिया जाएगा अर्थाक मृतक व्यक्ति यदि "रिश्ते" में बड़ा है तो सभी "छोटे" लोगों को "मुंडन संस्कार" के दौरान रीति-नीति अनुसार अपने अपने सिर के बाल कटवाना चाहिए ... बाल कटवाने का सीधा-सीधा तात्पर्य यह है कि उसके ऊपर से एक "साया" का चला जाना ... अर्थात जिस व्यक्ति ने भी "मुंडन संस्कार" के दौरान सिर के बाल कटा कर "मुंडन" कराया है उसे देखते ही समाज के अन्य लोग समझ जायेंगे कि उसके सिर से एक सुरक्षा रूपी "साया" उठ गया है ... अर्थात हर उस व्यक्ति को जो मृतक से "रिश्ते" में छोटा है उसे निसंकोच सामाजिक व पारिवारिक मर्यादा के अनुसार "मुंडन" करा लेना चाहिए !!

Wednesday, December 8, 2010

जीवनचक्र

नंगे आये थे
सब यहाँ छोड़
नंगे चले जाना है !
............

है
खबर सबको
दौलतें छूट जायेंगी
लालच में डूबे हुए हैं !
............

गरीब
भूखा है
रोटी मिलेगी
दुआ जरुर देगा !

............

समेटेंगे
छिपा रहेगा
बांटेंगे काम आयेगा
मन को खुशियाँ मिलेंगी !
............

मेहनत
की रोटी
पेट भर देती है
नींद जाती है !
............

मजहबी
बातें
दीवारें बन रही हैं
और इंसान खौफजदा !
............

रियासतें
- सियासतें
कोठियां और महल
खंडहर हो गए हैं !
............

लड़ाई
भी चलेगी
और चलते रहेगी
हम इंसान जो हैं !
............

थे
जानवर पहले
लड़ना, घूरना, गुर्राना
कैसे भूल जाएँ !
............

नक़्शे
, सरहदें देश
सब ज्यों के त्यों रहेंगे
बस इंसान गुजरते रहेंगे !!!

Saturday, August 14, 2010

स्वतंत्रता से अभिप्राय ........... एक कडुवा सच !!!

स्वतंत्रता, आजादी, स्वछंदता, मनमौजीपन किसे पसंद नहीं है इस धरा पर जीवन-यापन करने वाला प्रत्येक इंसान स्वतंत्रता पूर्वक जीवन जीना चाहता है पर उसकी स्वतंत्रता के मायने क्या हैं और क्या होना चाहिए !

... स्वतंत्रता का सीधा-सीधा तात्पर्य एक अनुशासित मर्यादित जीवन को जीने से है क्या हम अनुशासित मर्यादित जीवन जी रहे हैं ?

... शायद इस प्रश्न के उत्तर में ढेरों लोग यह चिल्लाने लगें कि हाँ हम अनुशासित मर्यादित जीवन जी रहे हैं, बहुत से लोग आपस में घुसुर-पुसुर करने लगें तथा बहुत से लोग बिलकुल मौन हो जाएँ ... कुछ भी संभव है !

... हम क्या सोच रहे हैं, हम क्या कर रहे हैं, और क्या हमारे अन्दर है ... संभवत: तीनों में विरोधाभाष हम स्वयं महसूस करें, यह विरोधाभाष क्यों - किसलिए !

... इसमे आश्चर्यजनक ज्यादा कुछ नहीं है हम मानव हैं और मानव जीवन जी रहे हैं इसलिए यह विरोधाभाष हो सकता है सांसारिक जीवन स्वमेव आश्चर्यो का एक पुलिंदा है जहां हर क्षण उथल-पुथल होते रहते हैं किन्तु हमें इस उथल-पुथल को संयमित करते हुए अनुशासन बनाकर मर्यादित स्वतन्त्र जीवन जीना चाहिए !

Sunday, July 11, 2010

क्या हम गुलाम हैं !

..... यह मनन करने योग्य है, सुबह से उठकर रात के सोने तक क्या हम वह ही करते हैं जो मन कहता जाता है, चाय, दूध, नाश्ता, पान, गुटका, जूस, मदिरा, वेज, नानवेज, प्यार, सेक्स, दोस्ती, दुश्मनी, चाहत, नफ़रत ... संभवत: वह सब करते हैं जो मन कहता जाता है .....

क्या हम मन के गुलाम हैं !

Friday, July 2, 2010

प्रार्थना

..... संभव है ईश्वर ने आपके लिये, आपके द्वारा प्रार्थना में चाहे गए "विशेष उद्देश्य" से हटकर "कुछ और ही लक्ष्य" निर्धारित कर रखा हो, ऎसी परिस्थिति में प्रार्थना में चाहे गए लक्ष्य तथा ईश्वर द्वारा आपके लिये निर्धारित लक्ष्य दोनों समय-बेसमय आपकी मन: स्थिति को असमंजस्य में डालने का प्रयत्न करेंगे .....

Monday, June 7, 2010

मानव धर्म क्या है !!!

यह सच है कि मेरे कदम आध्यात्म की ओर बढ रहे हैं ...

... इसी कडी में मैंने कल एक पोस्ट लिख कर आचार्य जी को ईमेल कर दी थी ...

... "मानव धर्म" ... अभी देखा वह पोस्ट उन्होंने अपने ब्लाग पर प्रकाशित की हुई है ...

... धन्य हैं आचार्य जी ...

... आईये आप भी पढें .... मानव धर्म क्या है !!!

... आप सभी से आग्रह है कि आप अपनी "कडवी-मीठी" प्रतिक्रिया अवश्य प्रदान करें .... आभार !!!!!

Sunday, June 6, 2010

.... धन्य है ब्लागदुनिया !!!

ब्लागजगत में कदम रखते समय कभी नही सोचा था कि "ब्लागदुनिया" सचमुच इतनी मायावी व प्रभावी होगी ... सचमुच चमत्कार से कम नही है .... न जाने कितने महापुरुषों से परिचय करा दिया ... सचमुच धन्य है ब्लागजगत !!! ... एक ऎसा प्लेटफ़ार्म जो अंतर्राष्ट्रीय पहचान देता है ... अदभुत है ... इसी क्रम में ... आप जानते हैं मैंने पिछली पोस्ट पर उल्लेख किया था कि आचार्य जी से मायावी ढंग से परिचय हो गया उन्होंने मुझे जो मान दिया ... सचमुच मैं उनका आभारी हूं ...

... आध्यात्म की ओर बढते कदम में ... कल मैंने एक लेख लिखा जिसे आचार्य जी को ईमेल कर दिया इस आशा के साथ ... संभवत: उन्हे पसंद आ जाये और उनके ब्लाग पर स्थान मिल जाये ... यही हुआ ... अभी सुबह उठकर देखा मेरा लेख प्रकाशित है ... कल क्या है !... आप सभी से भी आग्रह है कि आप मेरे आध्यात्मिक लेख पर अपनी अपनी "कडुवी अथवा मीठी" प्रतिक्रिया अवश्य प्रदान करें ... धन्यवाद ... आभार .... सचमुच .... .... धन्य है ब्लागदुनिया !!!

Saturday, June 5, 2010

... खुबसूरत नवयौवन लडकी !!

विगत कुछ दिनों से मेरा मन स्वमेव अध्यात्म की ओर बढ रहा है ... कुछ अध्यात्मिक लिखने का सोच रहा हूं ... पर क्या लिखूं, कैसे शुरु करूं .... मन में उथल-पुथल चल रही है ... पर ये तो तय है कि मेरे कदम अध्यात्म की ओर बढ रहे हैं ....

... कल एक खुबसूरत नवयौवन लडकी को गुलाबी फ़्राक पहने हुये संध्याकाल के समय बाजार में देखा ... सचमुच बहुत खुबसूरत लगी ... पर मैं यह सोचते रहा कि वह लडकी खुबसूरत है ... या मेरी आंखें उसे खुबसूरती की निगाह से देख रही हैं ... या फ़िर मेरा मन उसे खुबसूरत बना रहा है .... ये तीनों सवाल मेरे मन में बिजली की तरह कौंधने लगे ... कई घंटे मैं मनन - चिंतन करते रहा ... नतीजन मुझे यह मानना पडा कि ... मेरा मन उसे खुबसूरत बना रहा था !!

... क्या सचमुच मेरे कदम .... अध्यात्म की ओर बढते कदम हैं !!!