Monday, July 11, 2011

मुंडन संस्कार अर्थात एक साये का उठ जाना !

भईय्या प्रणाम ...
आओ अनुज, खुश रहो, कैसे हो !
ठीक हूँ भईय्या, एक बेहद गंभीर सामाजिक व धार्मिक टाईप की समस्या से कल सामना हो गया, मैं भी ज़रा भौंचक रह गया, और क्या जवाब देता यह भी नहीं समझ पाया !
अरे, क्या समस्या आ गई, वो भी तेरे जैसे समझदार आदमी के पास, हमें भी बताओ, क्या समस्या है !
हाँ भईय्या, हुआ दर असल यह कि कल रात मोहल्ले में एक लड़का जिसकी उम्र लगभग १८-१९ साल होगी, गुजर गया अर्थात स्वर्ग सिधार गया ... अब समस्या यहाँ पर ये आई कि उसके घर में छोटी-बड़ी उम्र के अनेक सदस्य हैं, कहने को भतीजा बड़ा है, और तो और पोते भी हो गए हैं ... कहने का मतलब यह है कि उम्र का कोई हिसाब-किताब नहीं है, अब आप तो समझते ही हो कि गाँव-देहात में बच्चे-पे-बच्चे होते रहते हैं, और शादियों -पे-शादियाँ भी ... मतलब रिश्ते में उम्र का छोटा-बड़ा रिश्ता अर्थात उम्र से भी बड़ा कभी कभी रिश्ता निकल आता है ... अब यहाँ पर समस्या यह है कि अग्निदाह संस्कार के बाद कौन कौन "मुंडन" कराएगा तथा कौन कौन नहीं कराएगा ... अर्थात सामाजिक व धार्मिक रीतिरिवाजों के अनुसार "मुंडन" किसको कराना चाहिए और किसको नहीं कराना चाहिए, ये समस्या सामने आ के खड़ी हो गई !
हाँ, सच कहा, समस्या तो है पर उतनी गंभीर नहीं जितनी तुझे लग रही है !
भईय्या सिर्फ मुझे ही नहीं, कल रात को तो गाँव के चबूतरे पर चौपाल लगी थी उसमें यह मुद्दा उठ गया ... पर कोई स्पष्ट समाधान नजर नहीं आया ... इसलिए ही मैं आज सुबह सुबह आपके पास आया हूँ ... अब आपके अलावा गाँव में और है कौन, जिससे समस्या का समाधान ... !
अरे, कोई भी पुराना आदमी बता देगा !
लगभग सभी पुराने, बुजुर्ग तो थे ही, फिर भी "कन्फ्यूजन" बना हुआ था ... अब आप ही बताओ, समाधान !
आ, पास आकर बैठ, और "कान खुजा के बैठ" ... एक ही बात बार बार नहीं बताऊंगा ... बात दर असल यह है कि "मुंडन संस्कार" की परम्परा लम्बे अर्से से चली आ रही है, अब इसके सामाजिक व धार्मिक तौर-तरीके क्या हैं वह तो मैं नहीं जानता, पर जितना सुना और जाना है मैंने, उसके अनुसार ही बता रहा हूँ ... तू मुझसे तर्क-वितर्क के हिसाब से कोई पोथी-पुराण संबंधी तथ्य मत पूंछने बैठ जाना, क्योंकि वह मैं नहीं दे पाऊंगा, वह तो कोई पंडित या शास्त्रों का जानकार ही बता पायेगा ... अगर तू "कान खुजा" के बैठ गया है तो सुन ... किसी भी बात को दोबारा नहीं बताऊंगा !
हाँ भईय्या ... आप बताओ ... कान भी खुजा लिए हैं और आँख भी मींड ली हैं !
बहुत बढ़िया ... तू काफी समझदार हो गया है, कान खुजाने के सांथ सांथ आँखे भी मींड कर बैठ गया है मतलब आँख और कान दोनों खुले रखेगा, शाबास ... तो सुन, सिर के बाल मानव शरीर में "साये" की तरह होते हैं अर्थात सुरक्षा-रक्षा के प्रतीक होते हैं, दूसरी तरह से कह सकते हैं मन, मस्तिष्क, आत्मा, सिर, के ऊपर "साया' के प्रतीक के रूप में होते हैं, सीधे शब्दों में कहूं तो "साया" होते हैं भले रक्षा कर पाएं या नहीं ... ठीक इसी प्रकार सामाजिक व पारिवारिक चलन में "रिश्ते" को "उम्र" से बड़ा माना गया है, फिर भले किसी की "उम्र" कम ही क्यों न हो पर यदि वह "रिश्ते" में बड़ा है तो "बड़ा" ही माना जाएगा ... तात्पर्य यह है कि अगर "चाचा" उम्र में छोटा है और "भतीजा" उम्र में बड़ा है इस स्थिति में "रिश्ते" के हिसाब से "चाचा" ही बड़ा माना जाएगा ... और जो रिश्ते में बड़ा है वह ही बड़ा रहेगा तथा सभी छोटों को उनके सामने झुकना पडेगा अर्थात अदब से पेश आना पडेगा, उनकी आज्ञा का पालन करना पडेगा ... अब हम तेरे सवाल पे आते हैं, किसी भी व्यक्ति के मरने पर उसकी "उम्र" को महत्त्व न देते हुए "रिश्ते" को महत्त्व दिया जाएगा अर्थाक मृतक व्यक्ति यदि "रिश्ते" में बड़ा है तो सभी "छोटे" लोगों को "मुंडन संस्कार" के दौरान रीति-नीति अनुसार अपने अपने सिर के बाल कटवाना चाहिए ... बाल कटवाने का सीधा-सीधा तात्पर्य यह है कि उसके ऊपर से एक "साया" का चला जाना ... अर्थात जिस व्यक्ति ने भी "मुंडन संस्कार" के दौरान सिर के बाल कटा कर "मुंडन" कराया है उसे देखते ही समाज के अन्य लोग समझ जायेंगे कि उसके सिर से एक सुरक्षा रूपी "साया" उठ गया है ... अर्थात हर उस व्यक्ति को जो मृतक से "रिश्ते" में छोटा है उसे निसंकोच सामाजिक व पारिवारिक मर्यादा के अनुसार "मुंडन" करा लेना चाहिए !!

3 comments:

Rahul Singh said...

उम्र पर भारी रिश्‍ते.

शहरोज़ said...

निसंदेह प्रेम और स्नेह के रिश्ते ही बड़े होते हैं. अत्यंत मार्मिक पोस्ट!
हमज़बान की नयी पोस्ट मेन इटर बन गया शिवभक्त फुर्सत हो तो पढें

anu said...

अपनों का ....साया उठने पर ...जो दर्द महसूस होता है ..वही आज आपका लेख पढ़ कर लगा