Friday, October 20, 2017

एक शब्द ...

लोग ..
न जाने .. क्या-क्या लिख देते हैं
और मुझसे .. एक शब्द लिखा नहीं गया


प्रेम
आस्था
विश्वास
समर्पण
बगैरह-बगैरह ..
लिखने की मेरी तमाम कोशिशें नाकाम रहीं

एक शब्द
अब तक .. अपूर्ण है
कोशिशें .. आज भी जारी हैं
शायद ..
किसी क्षण, किसी पल ... पूर्ण हो जाए .... !

Saturday, September 30, 2017

सच .. मैं .. रावण हूँ ... !

अबे .. चूजो ...
घोंचुओ ...
भोंपुओ ...
पप्पुओ ... चप्पुओ ...

रात-दिन .. दुम हिलाने वाले टट्टुओं ...
अब तुम ...
राम बनने की कोशिश ... न करो ....

क्या तुम मेरे पुतले को जलाकर राम बन जाओगे ???

सुबह-शाम .. तलुए चाँटने वाले स्वयं-भू सूरमाओ
क्या तुम्हें तनिक भी शर्म नहीं है ... ?
क्या तुम्हारे अंदर का खून पानी हो गया है ... ?
क्या तुम्हारा जमीर मर गया है ... ?

जो तुम .. मेरे पुतले के सामने ... सीना ताने खड़े हो
जलाओ ...
चलाओ तीर ...
फूंक दो .. मुझे .... और ...
अकड़ के खड़े रहो .. बिना रीढ़ वालो ..... !!

शायद .. तुमसे ...
भृष्टाचारियों ... मिलावटखोरों .... ठगों .....
ढोंगियों .. पाखंडियों .. के विरुद्ध .. कुछ होगा भी नहीं ...

क्यों ? ... क्योंकि -
तुम्हें ..
मेरा पुतला .. जलाने ... देखने ... तालियाँ बजाने ...
की आदत-सी हो गई है ... !

गर .. दम है ... तो ....
जला के दिखाओ ... उसे .. उन्हें ... जिनमें मैं ....
आज भी ज़िंदा हूँ .. जी रहा हूँ ....
हाँ .. सच ... मैं .. रावण हूँ .... अजर हूँ .. अमर हूँ .... !!!

Friday, September 29, 2017

संघर्ष

"जीवन का दूसरा एक नाम संघर्ष भी है ... यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण जरूर लगता है पर यह सच है कि .. जीवन की राह / राहें बेहद कठिन हैं ... जन्म से लेकर मृत्यु तक कदम-कदम पर संघर्ष है ....

ऐसा नहीं है कि ऐसे हालात सब के लिए हैं / होते हैं .... संसार में लगभग 10% ऐसे लोग भी हैं / होते हैं जिनके जीवन की राहें 'बाय बर्थ' नेशनल हाइवे की तरह स्मूथ होती हैं अर्थात ये लोग राजयोग में पैदा होते हैं जिनके जीवन में संघर्ष का कोई स्थान ही नहीं होता ...

खैर .. छोडो ... राजयोग की बातों में पड़ना उचित नहीं है ... सच तो ये है कि हम सभी कर्म प्रधान जीवन जी रहे हैं कर्म ही हमें अपने लक्ष्य पर पहुँचा सकते हैं, हमें सुख और शान्ति दे सकते हैं ....

हमारे कर्म व हमारी सोच कितनें सकारात्मक हैं ये हमारे जीवन व संघर्षों का निर्धारण करेंगे / करते हैं ... कर्म व सोच की सकारात्मकता वह ऊर्जा है जो संघर्षों को सुख व शान्ति में बदल देती है ....

सकारात्मक सोच .. सकारात्मक कर्म ... सकारात्मक आहार अर्थात विटामिन व मिनरल्स युक्त पौष्टिक आहार ... हमारे तन और मन को ऊर्जा प्रदान करते हैं ... संघर्षों से मुक्त करते हैं ....

हम अच्छे स्वास्थ्य के लिए कितने सजग हैं ... देखें .. जाँचें ... परखें .. और हमेशा सजग रहें ....
स्वस्थ्य रहें, मस्त रहें ....
स्वस्थ्य हैं तो जान है ... जान है तो जहान है !"

~ श्याम कोरी 'उदय'

Tuesday, September 26, 2017

सेहत व तंदुरुस्ती

मित्रों .....
आज मैं एक ऐसे विषय पर चर्चा करने जा रहा हूँ जो हमारी सेहत व तंदुरुस्ती के लिए बेहद आवश्यक है .. बचपन में .. हम .. अक्सर ...

कुछ भोज्य पदार्थों को बहुत पसंद व चाव से खाते हैं .. और कुछ भोज्य पदार्थों को सामने देखते ही नाक-मुंह सिकोड़ने लगते हैं ...  उदाहरण के तौर पर कुछ लोग भिन्डी नहीं खाते .. कुछ करेला नहीं खाते .. बगैरह-बगैरह ...

इस तरह की आदतें बड़े हो जाने पर भी कुछ लोगों में बनी रहती हैं .. बड़े होने के बाद भी कुछ लोग कुछेक भोज्य पदार्थों को देखकर नाक-मुंह सिकोड़ते देखे जाते हैं ...

इस विषय पर मेरा चर्चा का आशय मात्र इतना है कि .. जितना मैंने भोज्य पदार्थों में पाये जाने वाले विटामिन्स व मिनरल्स के बारे में पढ़ा व सुना है ... उसके अनुसार प्रत्येक भोज्य पदार्थ हमारी सेहत के उपयोगी व महत्वपूर्ण है ...

हम .. दूध से, घी से, शहद से, करेला से, भिन्डी से, नीबू से, मैथी से, इत्यादि भोज्य पदार्थों से ... परहेज करना छोड़ दें ... सभी को गले से लगायें, सभी का सेवन आरम्भ करें .. भले छोटी-छोटी मात्रा में करें ... पर सेवन जरूर करें...

यहाँ .. मैं यह नहीं कह रहा कि प्रतिदिन खायें ... एक टारगेट बना लें कि प्रति सप्ताह खाना है या माह में कम से कम दो बार जरूर खाना है ... यह सेवन हमें वो विटामिन्स व मिनरल्स देगें जो हमारे अच्छे स्वास्थ्य के लिए अति-आवश्यक हैं ....

एक समय के बाद .. यदि हमें कड़वी दवाईयां खाने से बचना है ... शॉपिंग मॉल की तरह तने व्यावसायिक अस्पतालों में जाने से बचना है .. तो ... हमें अपनी सेहत का स्वयं ध्यान रखना होगा ... नहीं तो .... उफ्फ .....

लापरवाही .. लापरवाहियां ... उफ्फ ....
स्वस्थ्य हैं तो जीवन है ... जान है तो जहान है .... !

~ श्याम कोरी 'उदय'

Monday, September 11, 2017

अनुभव व शोध

प्रिय मित्रों

वैज्ञानिक चिकित्सा हो ...
या आयुर्वेदिक चिकित्सा हो ...
या हों दादा, दादी, नाना, नानी के घरेलु उपचार ...

लगभग सभी उपचार अपने-अपने अनुभव व शोध पर आधारित हैं, .. कहीं शोध ज्यादा तो अनुभव कम है ... कहीं अनुभव ज्यादा तो शोध कम है .... तो कहीं-कहीं शोध और अनुभव दोनों का पर्याप्त मिश्रण है ....

मेरे अनुभव अनुसार वह उपचार श्रेष्ठ है जहां अनुभव और शोध दोनों का पर्याप्त मिश्रण है .... व्यवहारिक अनुभव की कमी की स्थिति में आधुनिक वैज्ञानिक उपचार भी उतना कारगर नहीं है जितना कारगर घरेलु उपचार है ....

यहाँ मेरा आशय एक उपचार को श्रेष्ठ और दूसरे को बेकार बताना नहीं है ... मेरा आशय यहां अनुभव व शोध से मिश्रित उपचार को श्रेष्ठता की श्रेणी में रखने व तौलने से है ... जहाँ किसी एक चीज की भी कमी है वहाँ श्रेष्ठता की भी कमी है .. ऐसा मेरा मानना है, मेरा अनुभव है ....

लगभग सभी उपचार समान तथ्यों पर आधारित हैं ... उदाहरण के तौर पर यदि 'शुगर' की बीमारी है तो सभी उपचार - अंग्रेजी, देशी, घरेलु, इत्यादि ... सभी हमें मीठी वस्तुएँ खाने से रोकते हैं तथा ऐसी दवा देते हैं जो हमारे शरीर में शुगर की उत्पन्नता को रोकें .....

जहाँ तक मेरा मानना है अर्थात मैंने अनुभव किया है .. लगभग सभी उपचार के तरीकों में शामिल होने वाली दवाइयों में रोग को मारने वाले तत्वों का मिश्रण लगभग एक समान ही होता है ... कहीं थोड़ा ज्यादा तो कहीं थोड़ा कम ....

यहाँ मेरा आशय 'कान को पकड़ने' से है ... कोई 'कान' को सीधा पकड़ रहा है तो कोई हाथ घुमा कर पकड़ रहा है .... कोई 'कान' को जोर से पकड़ रहा है तो कोई हल्के से ..... उपचार के तरीके व तत्व ( इंग्रीडिएंस, फार्मूले ) लगभग एक समान हैं ......

समय पर उपचार के लिए पहुँचना .. उपचार हेतु श्रेष्ठ माध्यम प्राप्त होना .... श्रेष्ठ व सर्वोत्तम उपचार के लिए आवश्यक हैं .... लापरवाही बीमार व्यक्ति और उपचार कर्ता दोनों के लिए घातक है .....

लापरवाही ... उफ्फ ......
स्वस्थ्य रहें, खुश रहें ... जान है तो जहान है ..... !

~ श्याम कोरी 'उदय'