Wednesday, April 2, 2014

तबज्जो ...

जब जी-हुजूरी और चमचागिरी ही मकसद था 'उदय' 
तो जरुरत क्या थी उन्हें, कवि या लेखक बनने की ? 
… 
उन्ने प्रचार की जगह दुस्प्रचार को तबज्जो दी है 
अब 'खुदा' ही जाने, कैसे हो पक्की जीत उनकी ?
… 
लो 'उदय', सोशल साइट्स सोशल न हुईं घर का आँगन हुई हैं 
पति पत्नियों को, और पत्नियां पतियों को प्रमोट कर रही हैं ? 
… 
वैसे, इस बार तो सत्ता पे उनका हक़ था 'उदय' 
मगर अफसोस, उनका तरीका गलत निकला ?
उन्ने, उन्ने, उन्ने, उन्ने,…… सिर्फ दल ही तो बदली है 'उदय' 
कोई गुनह थोड़ी न किया है, जो वे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हों ?

3 comments:

राजेंद्र कुमार said...
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राजेंद्र कुमार said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (04.04.2014) को "मिथकों में प्रकृति और पृथ्वी" (चर्चा अंक-1572)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

प्रतीक माहेश्वरी said...

चुनावी मौसम का खुमार यहाँ भी झलक और छलक रहा है :)