Thursday, September 12, 2013

शातिर ...

दंगा, दंगे, दंगाई, आपस में लड़ रहे हैं सत्ताई
क्या करें अब हम 'उदय', चहूँ ओर हैं सौदाई ?

गर वो 'उदय', समय रहते अपनी फितरतों से बाज आ गए होते
तो आज, जेल की रोटी ……………........... नहीं खा रहे होते ?

उसके, दिल-औ-जज्बात बड़े शातिर निकले
कल किये वादों से, वो मुकर गए हैं आज ?

हाँ, अब लगभग यह तय हो गया है 'उदय', कि वह भगवान है
वर्ना गायब होने की कला आरोपियों में मुमकिन नहीं लगती ?

इस बार उन्ने, आँखों से गुस्सा बयाँ किया है यारो
अब 'खुदा' ही जाने, क्या गुस्ताखी हुई है हमसे ??

4 comments:

Lalit Chahar said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

क्या बतलाऊँ अपना परिचय ..... - हिंदी ब्लॉगर्स चौपाल - अंकः004

थोडी सी सावधानी रखे और हैकिंग से बचे

कालीपद प्रसाद said...

सामयिक ,सटीक शेर
latest post गुरु वन्दना (रुबाइयाँ)

Darshan jangra said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार - 13/09/2013 को
आज मुझसे मिल गले इंसानियत रोने लगी - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः17 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





प्रवीण पाण्डेय said...

सच है..