Monday, March 4, 2013

जज्बातों के सौदे ...


अब तुम, ये किस जिद में हो, हमें जाने दो 
कहीं ऐंसा न हो, तुम...........तुम न रहो ? 
... 
सच ही है 'उदय', हर एक आदमी में हैं दस-बीस आदमी 
बस, टटोलोगे, तो सब.......एक-एक कर मिल जायेंगे ?
... 
हमारे अल्फाज 'उदय', हमारे किसी काम के नहीं लगते 
पर, कोई चाहे तो, सहारे उनके......पार कर ले दरिया ?
... 
खरीद-फरोख्त के दौर में भी, पिछड़ गए हैं हम 
जज्बातों के सौदे, हम से मुमकिन नहीं ठहरे ? 

4 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

गहरे...

Rajesh Kumari said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार 5/3/13 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका स्वागत है|

वाणी गीत said...

जज्बातों के सौदे मुमकिन नहीं हमसे ...
कोई नहीं , कुछ ऐसे भी गुजार लेंगे !
भावपूर्ण !

ज्योति खरे said...

खरीद-फरोख्त के दौर में भी, पिछड़ गए हैं हम
जज्बातों के सौदे, हम से मुमकिन नहीं ठहरे ?waah marm ki baat