Wednesday, March 27, 2013

शर्म का पर्दा ...


वैसे तो, आज का हर आदमी, कवि है, कलाकार है 
बस, नहीं है तो,......एक अच्छा दुकानदार नहीं है ? 
... 
उनकी सिसकियाँ थमने का नाम नहीं ले रही हैं 'उदय' 
अब 'रब' ही जाने, कैसा जलजला आया है उन पर ??
... 
उनका भी अंदाज, कुछ अजब, कुछ गजब, कुछ निराला है 
खुद को ही,............................ खुद बधाई दे रहे हैं वो ? 
... 
कश्मकश, सपने, महकती रातें, और वो बेबाक लिपटना तेरा 
गर हम चाहें भी तो, कैसे...................भूल जायें वो मंजर ?
... 
मैंने तो 'उदय', सिर्फ आँख से शर्म का पर्दा हटाया है 
यहाँ तो लोग हैं, जो जिस्म भी खुल्ला ही रखते हैं ? 
... 

4 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की पूरी टीम की ओर से आप सब को सपरिवार होली ही हार्दिक शुभकामनाएँ !
आज की ब्लॉग बुलेटिन होली के रंग, स्लो नेट और ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Anonymous said...

मैंने तो 'उदय',सिर्फ आँख से शर्म का पर्दा हटाया है
यहाँ तो लोग हैं, जो जिस्म भी खुल्ला ही रखते हैं ?

Girish Billore Mukul said...

chaa gaye bhai

प्रवीण पाण्डेय said...

सन्नाट..