Monday, December 3, 2012

मकसद ...


उफ़ ! बड़ी अजीबो-गरीब है, .............. मुहब्बत उसकी 
कभी हंस के लिपटती है, तो कभी सहम के छिटकती है ? 
... 
मरते मरते भी... मौत न आई मुझको 
बस, तेरी एक उम्मीद ने ज़िंदा रक्खा ? 
... 
गुनह उनका, ..... काबिल-ए-माफी नहीं है दोस्त 
कलम की आड़ में, लूट मकसद हुआ था उनका ? 

7 comments:

yashoda agrawal said...

आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 05/12/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

अरूण साथी said...

साधू-साधू

अरूण साथी said...

साधू-साधू

expression said...

bahut khoob kaha...
anu

यशवन्त माथुर said...

बहुत बढ़िया सर!


सादर

prritiy----sneh said...

achhi panktiyan hain.

shubhkamnayen

sushma 'आहुति' said...

खुबसूरत अभिवयक्ति.....