Tuesday, November 27, 2012

इबादत ...


अब देखते हैं 'उदय', कितने 'आम' ....... सरेआम होते हैं 
या फिर, चोरी-छिपे किसी-न-किसी के 'ख़ास' बने रहते हैं ? 
... 
कुछ तो शर्म करो, ........... बेशर्मो 
देश की आबरू सरेआम लुट रही है ? 
...
हे 'खुदा', ............ मेरे उस रकीब को तू सलामत रख 
भले बद्दुआ में सही, उसकी इबादत में मेरा नाम तो है ?  
... 
बात पते की, पते पे पहुँच गई है 
आओ यारो, ..... जश्न मनाएं ?
... 
उफ़ ! भूख से बच्चे बिलख के सो गए हैं 
तनिक देर हो गई तन उसको बेचने में ?

3 comments:

ई. प्रदीप कुमार साहनी said...

आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (28-11-12) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
सूचनार्थ |

आशा जोगळेकर said...

उफ़ ! भूख से बच्चे बिलख के सो गए हैं
तनिक देर हो गई तन उसको बेचने में ?


बहुत दर्द है इन शेरों में खास कर अंतिम

प्रतीक माहेश्वरी said...

अंतिम पंक्तियाँ बहुत कुछ इस समाज के बारे में बयाँ करती है ..