Thursday, March 3, 2011

उफ़ ! बेशर्मी देखो, सरपंच दांत निपोर रहा है !!

हम तो तुम्हें, बचपन से, बड़ा मासूम समझते रहे

अरे, तुम तो आशिक़ी में हम से भी आगे निकले !

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क्या कहें, खुबसूरती की मल्लिका पे दिल आया है

रोका भी नहीं जाता, और सम्भाला भी नहीं जाता !

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जब तक मोहब्बत थी, वो संजीदा थे

सच ! दिल टूटते ही, बेख़ौफ़ हो गए !

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न जाने कब से, दस्तक दे रहा हूँ मैं

खोल, खोल, दिल के दरवाजे खोल !

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कब तक तुम्हें हम, यूं ही दूर से देखते रहें

कहो, वो घड़ी कब आयेगी, जब सामने रहें !

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भ्रष्टाचार और कालेधन के मसले सुलझाने में उलझे रहे

कहाँ से फुर्सत निकाल पाते, आम जन-मानस के लिए !

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सच ! पूरे महिने लुटते-लुटाते रहे

पर आज खुश हैं पहली तारीख है !

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अभी देखा ही नहीं हमने, तुमको जी भर के

कैसे हम, उत्साह में ही, शुक्रिया अदा कर दें !!

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हमारे गाँव में भ्रष्टाचार, शिष्टाचार हो चला है

उफ़ ! बेशर्मी देखो, सरपंच दांत निपोर रहा है !!

5 comments:

kshama said...

Ha,ha! Yebhee khoob kahee!!

प्रवीण पाण्डेय said...

दमदार।

राज भाटिय़ा said...

आज सब तरफ़ यही हाल हे

GirishMukul said...

असरदार

अरूण साथी said...

उघार के रख दिये...हमरे गांव मे....