Sunday, April 28, 2013

हिन्दी साहित्य ...


उनकी गलियों में, पाँव रखने से पहले ज़रा सोच लेते 
वो हिन्दोस्तां की तरह, तुम्हारे बाप की जागीर नहीं है ?
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सच ! आज उन्ने, उनकी फोटो पे चैंप दी है गजब की कमेन्ट 
ऐंसा लगता है 'उदय', फेसबुकिया मेट्रो में, है वीराना छाया ?
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मेहमानों को, घुसपैठिया कहना जायज नहीं है 'उदय' 
क्योंकि - अब वो सरहद पे नहीं, अपने आँगन में हैं ?
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अब तुम 'उदय', हिन्दी औ हिन्दी साहित्य की बातें न करो 
इक ये ही तो डगर है, जहाँ जिन्दों की कहीं कोई क़द्र नहीं ?
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बहुत अच्छे भी नहीं हैं ख्याल तुम्हारे 'उदय' 
फिर भी कहते हो तो चलो हम मान लेते हैं ? 
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Sunday, April 21, 2013

बादशाहत ...


दंगे तो दंगे हैं, फिर भले चाहे वो चौरासी के हों, या हों दो हजार दो के 
किसी भी दंगाई पे रहम, औ रहनुमाई की बातें हमें मंजूर नहीं होंगी ?
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ये उनके शेर हैं 'उदय', कोई डर्टी जोक नहीं हैं
जो लोग,........बेवजह ही ठहाके मारते रहें ? 
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हम जानते हैं 'उदय', वो अपनी पेशाबी औकात से बाज नहीं आयेंगे कभी 
पर, किन्तु, परन्तु, मगर, अगर, डगर, ...... आज उनकी बादशाहत है ? 
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अब हम, उन कुकुरमुत्तों की शान में क्या कहें 'उदय'
वे तो, बिना बादर, बिना खातु, कहीं भी ऊग जाते हैं ?
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तुम्हारा जब जी चाहे, हमें टटोल लिया करो 
वैसे भी, हमें खुद अपनी खबर नहीं रहती ?
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Wednesday, April 17, 2013

सर्टिफिकेट ...


सच ! ये "माँ" की दुआओं का ही तो असर है 'उदय' 
क़यामत की घड़ी में भी, हम सलामत चल रहे हैं !!
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आओ, करें कुछ मौज-मस्ती संग में यारा 
अकेले तुम अकेले हम, अच्छे नहीं लगते ? 
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तेरी चौखट पे, खुद-ब-खुद सिर झुक गया है मेरा 
माँ अब तू ही बता, आगे किस ओर इशारा है तेरा ?
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वो जब मिलते हैं 'उदय', तो हम हंस लेते हैं, वर्ना 
लाख बहाने भी, कम पड़ते हैं मुस्कुराने के लिए ?
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लो, वो उन्हें, नाकामयाबी का सर्टिफिकेट बांट रहे हैं 'उदय' 
जैसे, वो खुद कामयाबी की एक जीती-जागती मिशाल हों ?
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Monday, April 15, 2013

एहसान ...


हम जानते हैं 'उदय', हम कभी, उनके लिए नहीं लिखते 
जो, ....... चाहकर भी, कभी पल्लु से बाहर नहीं आते ?
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हद है 'उदय', जैसे कल ही सरकार बन रही हो उनकी 
जो आज, आपस में, खुद ही खेल रहे हैं राजा-राजा ?
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सच ! बहुत काफी हुए मुझपे तेरे एहसान अब यारा 
मुझे भी चूम लेने दे, कि - कुछ हो जाऊं मैं हल्का !!
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लो, अब वो भी उनके इशारों पे खूब नाँच रहे हैं 'उदय' 
सच ! ......................... वे गजब मदारी निकले ?
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उफ़ ! कहीं हम गिर न जाएँ गश खाकर 'उदय' 
तरह तरह के तंग लिबासों में देख कर उनको ?
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Friday, April 12, 2013

ढोंग ...


हम कैसे उनको उनके हाल पे छोड़ दें 'उदय' 
आखिर, उनका होना ही तो हमारा होना है ? 
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उफ़ ! जिनके चहरे पे झलक रहा है ढोंग 
फिर भी उन्हें,...पंडित कह रहे हैं लोग ?
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तुम्हें तो अक्सर ही हम सुनते आये हैं 'उदय' 
कभी हमारी भी तो तनिक सुन लिया कीजे ?
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तुम जब मिलते हो तो हम हंस लेते हैं, वर्ना 
लाख बहाने भी कम पड़ते हैं हंसने के लिए ?
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सच ! आखिर उन्हें भी तो, खुद को आजमाना था 
बस इसी फिराक में, वो देख के मुस्कुराए थे हमें ? 
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