Sunday, April 21, 2013

बादशाहत ...


दंगे तो दंगे हैं, फिर भले चाहे वो चौरासी के हों, या हों दो हजार दो के 
किसी भी दंगाई पे रहम, औ रहनुमाई की बातें हमें मंजूर नहीं होंगी ?
... 
ये उनके शेर हैं 'उदय', कोई डर्टी जोक नहीं हैं
जो लोग,........बेवजह ही ठहाके मारते रहें ? 
... 
हम जानते हैं 'उदय', वो अपनी पेशाबी औकात से बाज नहीं आयेंगे कभी 
पर, किन्तु, परन्तु, मगर, अगर, डगर, ...... आज उनकी बादशाहत है ? 
... 
अब हम, उन कुकुरमुत्तों की शान में क्या कहें 'उदय'
वे तो, बिना बादर, बिना खातु, कहीं भी ऊग जाते हैं ?
... 
तुम्हारा जब जी चाहे, हमें टटोल लिया करो 
वैसे भी, हमें खुद अपनी खबर नहीं रहती ?
... 

4 comments:

Rajesh Kumari said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल २३ /४/१३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां हार्दिक स्वागत है ।

ब्लॉग बुलेटिन said...

आज की ब्लॉग बुलेटिन भारत की 'ह्यूमन कंप्यूटर' - शकुंतला देवी - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

प्रवीण पाण्डेय said...

कोई टटोले तो गुदगुदी अवश्य हो जाती है..

Rahul said...

like it...