Friday, August 29, 2014

सिसकियाँ ...

न कोई हिसाब, और न कोई किताब
मर्जी के मालिक हैं, हम सरकार हैं ?

न जख्म, औ न ही हैं कहीं लहू के निशाँ
चोट दिल पे है सिसकियाँ कर रही बयाँ ?
तुझे देखूं, या डूब जाऊं तुझमें
है तेरा ये हुस्न शबाव पे आज ?

2 comments:

देवदत्त प्रसून said...

वाह कोरी जी ! बहुत सुन्दर प्रस्तुति !!

अरुण चन्द्र रॉय said...

bahut badhiya