Monday, June 30, 2014

सितम ...

क्यूँ मियाँ, क्यूँ तुम … आज इतने ठप्प बैठे हो
हमने तो सुना था गप्प से तुम बाज नहीं आते ?

सच ! तेरे इस नूर पे, सिर्फ हक़ हमारा है कहाँ
जिसे देखो उसी की नजरें तुझपे जाके हैं टिकीं ?

खुद से खुद की शिकायत
इतना सितम क्यूँ यारा ?
अब तुम जुदा होके भी खफा हो यारा
भला अब इसमें गल्ती कहाँ है मेरी ?
कैसे किस्से, औ कैसी कहानी 'उदय'
चोरों की बस्ती है, चोरों का राज है ?

7 comments:

yashoda agrawal said...
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yashoda agrawal said...

आपकी लिखी रचना बुधवार 02 जुलाई 2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

देवदत्त प्रसून said...

मित्र ! लम्बी बीमारी के बाद कल से आपके साथ हूँ !अच्छी रचना है !

Kailash Sharma said...

बहुत खूब...

कविता रावत said...

कैसे किस्से, औ कैसी कहानी 'उदय'
चोरों की बस्ती है, चोरों का राज है ?
………… सबकुछ उन्ही का इसीलिए तो बात भी उनकी ही होती है हम तो सुनने वाले भर के रह गए

बहुत खूब!

kavita verma said...

bahut khoob..

Rahul Kumar said...

visit me to read :गुज़ारिश ...

http://rahulpoems.blogspot.in/2014/06/blog-post.html