Saturday, December 21, 2013

एतबार ...

अक्सर, कभी-कभी, मुर्दे भी जाग पड़ते हैं 'उदय' 
फिर ये तो, … … जीता-जगता मुर्दा क़ानून है ? 
… 
अब तू, मुझ पर, ज़रा भी एतबार न कर 
हाँ, मैं फरेबी हूँ … फरेबी हूँ … फरेबी हूँ ?
… 
अब 'खुदा' ही जाने, है कौन कितने फासले पे 
सच ! चहूँ ओर, इंकलाबी मशालें जल रही हैं ?
… 
बस इक सिबाय तेरे, है सभी को एतबार हम पे 
कि हमने, तेरी मोहब्बत में भेष बदला हुआ है ? 
… 

3 comments:

मिश्रा राहुल said...

सुंदर चित्रण....
कभी पधारिए हमारे ब्लॉग पर भी.....
नयी रचना
"फ़लक की एक्सरे प्लेट"
आभार

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत खूब..

Maya said...

bahut acche

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