Tuesday, October 22, 2013

मसक्कत ...

हम ज़िंदा लोग हैं 'उदय', तब ही तो हिल-डुल रहे हैं 
वर्ना, क्या देखा है किसी ने कभी मुर्दों को हिलता ?
… 
'खुदा' जाने इतनी मसक्कत क्यूँ हुई है आज उनसे 
जिन्हें, कभी, हम, फूटी कौड़ी भी सुहाये नहीं थे ??
… 
हमसे मिले हो तुम कुछ अजनबी की तरह 
क्या तहजीब भूल गया है आज हुश्न तेरा ? 
… 
ज़रा फासले से मिला करो 
भ्रम, मिट जाएगा सारा ? 
… 
क़त्ल से, मंसा तो पूरी हो गई उसकी 'उदय'
पर, मुल्क के......... सपने अधूरे रह गए ?
...

3 comments:

राजेंद्र कुमार said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल गुरुवार (24-10-2013) को "ब्लॉग प्रसारण : अंक 155" पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

अरुण चन्द्र रॉय said...

सुन्दर रचना

कालीपद प्रसाद said...

बहुत उम्दा
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