Saturday, April 6, 2013

हिचकियाँ ...


उनकी तरह, उनका भी हक़ है हमें आजमाने का 
कोई तो होगा, ............ जो उधेड़ लेगा हमको ? 
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वो इक बार कह तो दें, कि - दंगाइयों संग रिश्ता-नाता है 
तो फिर, हमारी बस्तियाँ ............. हम खुद जला देंगे ? 
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लो, भरी दोपहर में, घोर अन्धेरा छा गया 
उफ़ ! मुहब्बत उनकी, दगाबाज निकली ? 
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तुम्हारी हिचकियाँ बयाँ कर रही हैं हाजिरी मेरी 
बस इतना तो बता दो, कब हम जुबाँ पे होंगे ?
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सच ! कभी टेड़ी तो कभी सीधी, खुद-ब-खुद हो जाती है 
ऐंसा सुनते हैं 'उदय', बहुत 'मुलायम' है दुम उनकी ??
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