Monday, March 18, 2013

ब्रेक-अप ...


सच ! जिस्म से रूह निकल रही है मेरे 
तनिक और ठहर जाओ तो सुकूं मिले ?
... 
न कद है न काठी है, न दिमाग है न खुबसूरती 
फिर भी, .......................... वो सरकार हैं ? 
... 
अब जब ब्रेक-अप हो ही रहा है तो हिसाब-किताब पूरा कर लो 
कहीं ऐंसा न हो, दो-चार चुम्बन तुम्हारे हमारे पास रह जाएँ ?
... 
जनता को मिर्गी की बीमारी है, या सत्ताधारियों को 
कोई तो बताये 'उदय', हम जूता सुंघायें किसे ????
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आओ किसी पुरानी बात को याद कर के ठहाके लगा लें 
वर्ना अब, ............. ठहाकों की वजहें मिलती कहाँ हैं ?
... 

6 comments:

yashoda agrawal said...

आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 20/03/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

ज्योति खरे said...

सार्थक और
सुंदर प्रस्तुति
बधाई
agrah hai mere blog main sammlit ho
jyoti-khare.blogspot.in

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत खूब..

ई. प्रदीप कुमार साहनी said...

आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (20-03-13) के चर्चा मंच पर भी है | जरूर पधारें |
सूचनार्थ |

शिवम् मिश्रा said...

बहुत खूब !

आज की ब्लॉग बुलेटिन होली तेरे रंग अनेक - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Kailash Sharma said...

बहुत खूब!