Thursday, February 14, 2013

वेलेन्टाइन-डे ...


रश्में ...

तुम कहो तो .... आओ ... 
वेलेन्टाइन-डे की ... रश्में निभा लें 
कहीं ऐंसा न हो, शाम होते-होते, 
तुम कोई ... 
नया इल्जाम ... 
हमपे ............... मढ़ दो सनम ? 
... 
... 
वेलेन्टाइन-डे ... 

उनके हाँथों में ... 
लाल, पीले, सफ़ेद, गुलाबी ...
रंग-बिरंगे ...
ढेरों ....... गुलाब देख के 
जी मेरा घबरा गया !
बस, ... यूँ समझ लो 
उसी क्षण ... 
वेलेन्टाइन-डे ... मनाने का 
सिर पे चढ़ा भूत ...
अपने आप ...... उतर गया ? 

2 comments:

Rajendra Kumar said...

यह सब पश्चमी सभ्यता का ढकोसला है,सुन्दर प्रस्तुती.

प्रवीण पाण्डेय said...

कहीं ये २४ घंटे निकल न जायें..