Thursday, November 22, 2012

करिश्माई ...


सौदागिरी का हुनर, हम सीख के भी क्या लेते 'उदय' 
क्योंकि - ईमान का सौदा हमसे मुमकिन नहीं होता ? 
... 
कहीं मातम, तो कहीं जश्न के मंजर हैं  
उफ़ ! मौत उसकी, करिश्माई निकली ?
... 
खौफ का साये में, वे सलाम को तो मजबूर थे 'उदय' 
किन्तु सलामती दुआ के लिये,.. उनके हाँथ न उठे ? 

2 comments:

Rahul said...

कहीं मातम, तो कहीं जश्न के मंजर हैं
उफ़ ! मौत उसकी, करिश्माई निकली ?

Bahut accha..uday ji

राकेश कौशिक said...

सौदागिरी का हुनर,हम सीख के भी क्या लेते उदय'
क्योंकि-ईमान का सौदा हमसे मुमकिन नहीं होता?