Wednesday, October 3, 2012

हुनर ...


जैसे पहले डूबी थी, वैसे ही इस बार भी डूबेगी लुटिया उनकी
फिर भले चाहे ...... वो कड़क हों, ......... या मुलायम हों ?
... 
उन्हें तो गुमान है 'उदय', सिर्फ ...... अपनी चतुराई पे 
और एक हम हैं, जो उनकी लेखनी में हुनर ढूंढ रहे हैं ?
... 
उन्होंने तय कर लिया है, कि हमें लिखना नहीं आता 
जब नहीं आता, तो क्या कहें, समझ लो नहीं आता ? 
... 
तमाम हो-हल्लों और घोटालों के बाद भी धूम है उनकी 
ये लोकतंत्र है, ..................... या भृष्टतंत्र है 'उदय' ? 
... 
लो, ढोंग से भरा चेहरा उसका, क्या खूब चम-चमाया है
क़त्ल का इल्जाम, जो उसने, किसी और पे लगाया है ? 

2 comments:

ई. प्रदीप कुमार साहनी said...

बहुत ही उम्दा रचना |
मेरी नई पोस्ट:-
करुण पुकार

आशा जोगळेकर said...

उन्हें तो गुमान है 'उदय', सिर्फ ...... अपनी चतुराई पे
और एक हम हैं, जो उनकी लेखनी में हुनर ढूंढ रहे हैं ?
...
उन्होंने तय कर लिया है, कि हमें लिखना नहीं आता
जब नहीं आता, तो क्या कहें, समझ लो नहीं आता ?

वाह क्या कटाक्ष है ।