Sunday, October 21, 2012

जी-हुजूरी ...


जूता पार्टी औ चांटा पार्टी नजर नहीं आ रही है यारो 
भ्रष्टाचारी ...... सरेआम, बे-खौफ घूम रहे हैं आज ?
... 
ये फ़रियाद नहीं है दोस्त, ... मुहब्बत है 
जिस दिन समझोगे, बहुत पछताओगे ? 
... 
नहीं है चाह हमें ....... बनावटी तमगों की 
फिर भला क्यूँ, हम उनकी जी-हुजूरी करें ? 
... 
अब तुम, इतना भी न इतराओ दिखा-दिखा कर 
कहीं ये हाँथ .................. बेकाबू न हो जाएं ? 
... 
उन्होंने, कुछ इस तरह, मुंडी हिला के 'हाँ' कहा था 
हमें महीनों लगा ऐसे, कि - .... जैसे 'ना' कहा हो !

1 comment:

प्रतीक माहेश्वरी said...

हाहा.. हाँ और ना वाला तो मस्त था..
खूबसूरत रचना..