Friday, June 22, 2012

चाहतों के मेले ...


जी चाहता है खो जाएं भीड़ में 
जिसे चाह होगी, वो तलाश लेगा हमें ? 
... 
सच ! पता बदल भी लें, पर जज्बात कहाँ बदलेंगे 
आज नहीं तो कल, हम फिर किसी से भिड़ लेंगे ? 
... 
और कितना डूब के देखें हम तेरे जज्बात यारा 
पानी का रंग भी, क्या कभी बदलता है सनम ? 
... 
'खुदा' जाने है या तुम, हमारी चाहतों के मेले 
चंहू ओर, ........ सिर्फ तुम्हारी ही आवाजें हैं !
... 
लो, बरसात भी पूरी तरह अब थम गई है 
पर, जिस्म की भभक से धुंआ उठ रहा है ! 

3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-062012) को चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Reena Maurya said...

bahut sundar rachana..
bahut khub....
:-)

ana said...

ati sundar