Wednesday, April 11, 2012

हाल-ए-मुफलिसी ...

कभी इस पार, तो कभी उस पार
बता आखिर तेरी रज़ा क्या है ?
...
'उदय' कहता है, जख्मों को छिपा के रखना यारो
जो भी देखेगा, कुरेद कर चला जाएगा !
...
हाल-ए-मुफलिसी किस किस से हम छिपाते 'उदय'
इसलिए, गुमनामियों में भी बसर की है जिंदगी !!

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

काश दिल का आकार समझ आ पाता।

Rajesh Kumari said...

achche sher likhe hain.kabhi vaqt mile to humare blog par bhi tashreef laaiyega.

Rahul said...

Very nice