Thursday, January 19, 2012

... जख्मों को हवा-पानी मिल गया !

सच ! जो दुम दबा कर भागने, के बड़े फनकार थे
लो, आज उन्हें बहादुरी का मिल रहा पुरूस्कार है !
...
क्या पडी थी झांकने की, खुद के भीतर आप ही
बेवजह, जख्मों को हवा-पानी मिल गया !
...
सच ! ये डगर, मेरी बस्ती को जाती नहीं है 'उदय'
न जाने क्यूँ, फिर पग मेरे, इस डगर पे बढ़ रहे हैं !
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काश ! वे जुबां की तरह, नजरें भी थाम लेते
ख़ामो-खां हमें आज उनका इंतज़ार न होता !
...
गप्प-गप्प सूतने से परहेज है किसे
जिधर देखो उधर, टपकती लार है !

4 comments:

परमजीत सिँह बाली said...

बहुत बढिया रचना है।

प्रवीण पाण्डेय said...

हा हा, सन्नाट

सदा said...

बेहतरीन प्रस्‍त‍ुति ।

Pallavi said...

सुंदर प्रस्तुति ....समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका सवागत है http://mhare-anubhav.blogspot.com/