Thursday, August 18, 2011

सच ! कहाँ रात, कहाँ दिन है !!

अब न तो सब, न रात की बात रही
बस दो घड़ी की मुलाक़ात बाकी है !
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न कर फक्र तू खुद पर, चंद लाइनें-किताबें लिख कर
किसी की सादगी देखो, ज़रा अहम भी नहीं दिखता !
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चलो जाने भी दो, अब छोड़ दो राहें
बातें मोहब्बत की, हमें भाती नहीं हैं !
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न जाने क्यों तुम मेरे दिल को भाने लगे
उफ़ ! हुआ सौदा तो सिर्फ जिस्म का ही था !
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हैं ऐंसे बहुत से लोग, जो फना होने के डर से, घर से बाहर नहीं आते
किसी की सादगी देखो जो तेरी-मेरी खातिर फना होने को आतुर है !
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क्या करें मजबूर हैं, सत्ता के नशे में चूर हैं
लड़ने को लड़ लेते हैं, पर सब भाई-भाई हैं !
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क्या अच्छा - क्या बुरा, कौन समझे और किस-किस को समझाए
उफ़ ! सत्ता की चाह में लोग मूकबधिर बने बैठे हैं, हम समझते हैं !!
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आँखों ने और दिल ने, मोहब्बत की थी तुझसे 'उदय'
दिल धड़कता रहा, आँखें देखती रहीं, जुबां खामोश रही !
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ये दीवानगी की धुन है 'उदय'
सच ! कहाँ रात, कहाँ दिन है !!

2 comments:

प्रतीक माहेश्वरी said...

वाह वाह! एक-एक पंक्ति बेहतरीन!

प्रवीण पाण्डेय said...

समय अपना अस्तित्व खो देता है।