Friday, July 29, 2011

बेचैनी ...

सच ! मन नहीं लगता
जब
मन उदास होता है
एक अजीब-सी बेचैनी होती है
सांथ सांथ !

हर घड़ी, हर पल
सन्नाटा-सा छाया होता है
हमारे आस-पास
हम चाहते हैं, बार बार चाहते हैं
दूर हो बेचैनी, हमसे !

पर, पुराने हर प्रयास की तरह
नया प्रयास भी
असफल-सा
लगता है !
हम घिरे होते हैं, घिर चुके होते हैं
बेचैनी से !

हम, पल-पल उम्मीदों के सांथ
न चाहकर, न चाहते हुए
वक्त के संग लड़ रहे होते हैं
जी रहे होते हैं !
हर घड़ी, हर पल, बेचैनी में !!

5 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बहुत परेशान करने वाला माहौल हो चुका है..

प्रवीण पाण्डेय said...

मन का हाल बाँचती कविता।

संजय भास्कर said...

एक-एक शब्द भावपूर्ण .

अशोक बजाज said...

भावपूर्ण कविता .

shabana kaleem said...

bahut khoob....