Thursday, July 28, 2011

घुप्प अंधेरा !

किसी सुनसान, सन्नाटे भरे
इलाके से, अकेले
जब गुजरते थे, हम
बचपन में !
तब
दिल, दिमाग, हाँथ, पैर
सन्न से हो जाते थे
गुजरते गुजरते
गुजर जाने तक
कभी कभी तो
गुजर जाने के बाद भी
कुछ दूर तक, सन्नाटा-सा
छाया रहता था
पर, तब से अब तक
हमने, कभी, सोचा नहीं था
डरे भी नहीं थे
सहमे भी नहीं थे
चल रहे थे
चलते चल रहे थे
बस चले-चल रहे थे
कि -
अचानक, कल, फिर
एक खबर सुनकर, चहूँ ओर
सन्नाटा-सा छा गया
सुन, सुनते ही
छा गया घुप्प अंधेरा
दिल और दिमाग पर ... !!

4 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

मानसिक स्तब्धता की स्थिति।

अशोक बजाज said...

आपको हरियाली अमावस्या की ढेर सारी बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं .

कुश्वंश said...
This comment has been removed by the author.
कुश्वंश said...

achchee baat kah dee thode shabdon me badhai