Thursday, April 28, 2011

वही बोतल, वही साकी ...

हुश्न की चौखटों पे, किसी की जातें नहीं होतीं
यह वो दरिया है, जहां हर कोई डूब जाता है !!

जिस चौखट पे, तुम पहुंचते हो छिपते-छिपाते
वहीं पे, सिर, मस्तक, आँखें, फिर क्यूं झुकाते हो !

जिसे कोसे फिरे तुम, दिनों - दिन महफिलों में
हुई रात, वहीं तुम, फिर आशियाना क्यूं बनाते हो !

जिसे तुम मान बैठे हो, है वो कोढ़ की दुनिया
उसी को मरहम समझ, जख्मों पे, फिर क्यूं लगाते हो !

जब तुम बाहर चले - निकले, तब पैर डग-मगाते हैं
पैर जब सांथ देते हैं, तब उसी चौखट पे, फिर क्यूं पहुँच जाते हो !

नहीं कोई जहां में, जो मैकदे जी जात पूंछ ले
है, वही बोतल, वही साकी, जिसे सब चूम लेते हैं !!

6 comments:

रूप said...

सुन्दर लेखन, गहरे भाव. बधाई ............. !

मनोज कुमार said...

अच्छा लगा।

राज भाटिय़ा said...

बहुत अच्छी लगी आप की यह रचना, धन्यवाद

सुशील बाकलीवाल said...

वही बोतल, वही साकी, जिसे सब चूम लेते हैं !!

बढिया प्रस्तुति. आभार सहित...

Bhagwan Singh Rawat said...

एक कडुआ सच और गंभीरता से भरी यह रचना
दिल को छु लेने वाली है , बहुत खूब

गुड्डोदादी said...

आह भरी रचना