Monday, March 21, 2011

हम तो चाहेंगे तुम्हें, जब तक जी चाहेगा ! !

कोई न भी कहे, तब भी हम तो तुम्हें चाहेंगे
सच ! तुम्हें देखे बिना, हमसे रहा नहीं जाता !
...
हमारी चाहतों का, अब कोई इम्तिहां न ले
हम तो चाहेंगे तुम्हें, जब तक जी चाहेगा !
...
अखबार ! जरुरत न सही, आदत सी पड़ गई है
कुछ अच्छा, कुछ बुरा, इसमें संसार दिखता है !
...
ये ठीक ही रहा मुन्नी की बदनामी रंग लाई
बदनाम भी हो गई, और नाम भी हो गया ! !

4 comments:

संजय भास्कर said...

कोई न भी कहे, तब भी हम तो तुम्हें चाहेंगे
सच ! तुम्हें देखे बिना, हमसे रहा नहीं जाता !
.............वाह!!!वाह!!! क्या कहने, बेहद उम्दा

संजय भास्कर said...

वाह !! एक अलग अंदाज़ कि रचना ......बहुत खूब

प्रवीण पाण्डेय said...

वाह।

राज भाटिय़ा said...

अति सुन्दर ।