Saturday, March 19, 2011

किसी की मजाल कहाँ थी जो इन मनहूसों को खरीद लेता ... !!

अब खंजर ही सच बयां कर सकते हैं 'उदय'
कलम कहीं बिक गई, तो कहीं गुलाम हुई है !
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तेरी खूबियाँ किसी इबादत से कम नहीं लगतीं
सच ! सोचता हूँ कहीं 'खुदा' तुमसा तो नहीं होगा !
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अफसरान खुदी की जगहंसाई में मस्त-मौला हुए हैं
उफ़ ! नेक-नियती से उन्हें परहेज सा हुआ है !
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हांथ खाली ही सही, पर हौसले बुलंद हैं
कुछ सपने सहेजना, और कुछ खरीदना बांकी है !
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किसी की मजाल कहाँ थी जो इन मनहूसों को खरीद लेता
वो तो इन्होंने खुद को हंसी-खुशी बेच दिया होगा !
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अब कोई हमें, जन्नत का दिलासा न दे
हम तो पहुंचे हैं यहाँ, उसी रास्ते होकर !
...

3 comments:

bilaspur property market said...

अब कोई हमें, जन्नत का दिलासा न दे
हम तो पहुंचे हैं यहाँ, उसी रास्ते होकर !

होली है
होली की हार्दिक शुभकामनायें
manish jaiswal
Bilaspur
chhattisgarh

संजय भास्कर said...

रंगों का त्यौहार बहुत मुबारक हो आपको और आपके परिवार को|

Manpreet Kaur said...

बहुत ही सुंदर रचना है जी !हवे अ गुड डे ! मेरे ब्लॉग पर आये !
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