Wednesday, March 16, 2011

कौन जाने किस घड़ी, अपनी घड़ी भी आयेगी !!

जाने कब तलक, हम खुद को आजमाएंगे
चलो छोडो, क्या रक्खा है पुरानी रंजिशों में !
...
हम मोहब्बत को, और मोहब्बत हमें आजमाती रही
उफ़ ! बला थी मोहब्बत, बस जिन्दगी गुजरती रही !
...
उफ़ ! प्यार कर के हमने गुनाह कर दिया
आज मालुम पडा, उन्हें दोस्ती पसंद थी !
...
चलो मिल बैठ कर, कुछ बातें कर लें
जन्नतों सी खुशी, दो घड़ी में गुजर कर लें !
...
जब से देखा है तुम्हें, चैन गायब है हुआ
जब भी देखें हैं तुम्हें, चैन मिल जाता है !
...
सच ! अब क्या कहें, पैर मिरे जमीं पे नहीं रहते
दुआओं के असर ने, आसमां पे बैठाया है मुझे !
...
क्रिकेट ! हमने तो हार तय कर रक्खी थी
उफ़ ! मजबूर थे खेलना पडा, हार गए !
...
सच ! लेखकों की भीड़ देखो, बड़ रही है हर घड़ी
कौन जाने किस घड़ी, अपनी घड़ी भी आयेगी !!

5 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

घड़ी हर एक की आती है, किस घड़ी आयेगी, नहीं ज्ञात।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

nice...

निर्मला कपिला said...

इस घडी को कोई नही रोक सकता। अच्छी रचना के लिये बधाई।

Manpreet Kaur said...

बहुत ही ऊम्दा शब्द है जी ! हवे अ गुड डे
मेरे ब्लॉग पर आये !
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राज भाटिय़ा said...

हम मोहब्बत को, और मोहब्बत हमें आजमाती रही
उफ़ ! बला थी मोहब्बत, बस जिन्दगी गुजरती रही !
बहुत सुंदर गजल, धन्यवाद