Sunday, February 27, 2011

भ्रष्टाचारियों के चेहरे ही, क्यों न काले करने पड़ जाएं !!

कब तक, हम गुजारिश-पे-गुजारिश करते रहें
वो घड़ी कब आयेगी, जब शुक्रिया अदा करें !
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आज देखी, पहली बार, इतनी दीवानगी हमने
जैसे लगा, कोई देख नहीं, खेल रहा हो क्रिकेट !
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हरे पत्ते जो झर गए हैं, सबको समेटा जाए
शायद, दौना-पत्तल बनाने के काम जाएं !
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सच ! ताउम्र मैं डूबा रहा, तेरे ख्यालों में
जाने क्यों, आज अपना ख्याल आया !
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कोई उतना भी, मासूम नहीं लगता
जितना उसे, बस्ती के लोग कहते हैं !
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हारते हारते, जीतते जीतते, बच गए
एक-दो नहीं, सारे निकम्मे निकले !
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डरे, झडे, गिरे, मरे, पड़े, हरे, पत्ते
सब पत्ते, हरे हरे, पत्ते पत्ते, हरे हरे !
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दोस्ती, कुछ इस सलीखे से की जाए
खफा होने की भी गुंजाईश रखी जाए !
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आज मन उदास है, चलो कहीं दूर चलें
सिर्फ तुम, तुम और मैं, पैदल पैदल !
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कालाधन विदेशों से वापस आकर ही रहेगा, भले चाहे
भ्रष्टाचारियों के चेहरे ही, क्यों काले करने पड़ जाएं !!

5 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत खूब।

निर्मला कपिला said...

देखें क्या होता है काला धन वापिस आता है या कालेधन के नाम पर और काला धन जमा होता है।

Rahul said...

सच ! ताउम्र मैं डूबा रहा, तेरे ख्यालों में
न जाने क्यों, आज अपना ख्याल आया !
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Very nice..i was trying to converge all lines with Kala Dhan!!

Rahul said...

सच ! ताउम्र मैं डूबा रहा, तेरे ख्यालों में
न जाने क्यों, आज अपना ख्याल आया !
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Very Nice Uday Ji

राज भाटिय़ा said...

सिर्फ़ का्ले ही नही इन के गले मे जुतो के हार भी डले जाये....बहुत सुंदर, धन्यवाद