Tuesday, February 15, 2011

उफ़ ! कहीं अपना वतन, मुर्दाघर न बन जाए !!

मिटाना है तो मिटा डालो, भ्रष्टाचारी मंसूबों को
गर टूटें, तो कर दो सन्नाटा सारे वतन में !
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अपने देश में, कुत्तों सा हुनर बहुतों में है
बस वफादारी की दुम कहीं दिखती नहीं !
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अरे, ये क्या बात हुई, गुगली या बाऊंसर
उफ़ ! कोई खेलता रहे, और हम हार जाएं !
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तुम, हम, रोज, दिन, रात, जिन राहों पे चलते रहे
उफ़ ! आज, अजीब सा कुछ हुआ, हम फंस गए !!
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कोई हमें चाहता बहुत है,पर डर डर के मिलता है
उफ़ ! क्या ज़माना है, प्यार करना मुश्किल है !!
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सारे भ्रष्टाचारी, विदेशी बैंकों में जमा कालाधन
शर्मिंदगी में, खुद--खुद सौंप दें, काश ऐसा होता !
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क्यूं एक नया, ऐसा सिस्टम बनाया जाए
सच ! केंद्र राज्यों का झगड़ा मिटाया जाए !
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सिर से पाँव तक, सारा का सारा देश पथभ्रष्ट है
हे 'भगवन' ! अब तुम ही कोई नई राह दिखाओ !
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इतिहास के पन्नों में, स्वर्णअक्षरों में नाम
उफ़ ! लालसा में लोग छींटाकशी पे उतारू हैं !
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अभी भी वक्त है, भ्रष्टाचारी इरादे भांप लो यारो
उफ़ ! कहीं अपना वतन, मुर्दाघर बन जाए !!

3 comments:

संजय भास्कर said...

कमाल की लेखनी है आपकी लेखनी को नमन बधाई

निर्मला कपिला said...

अभी भी वक्त है, भ्रष्टाचारी इरादे भांप लो यारो
उफ़ ! कहीं अपना वतन, मुर्दाघर न बन जाए !!
बिलकुल सही कहा। बेहतरीन रचना। बधाई\

प्रवीण पाण्डेय said...

जहाँ बड़े बड़े विषयों पर भी चुप्पी हो, उसे और क्या कहेंगे?