Friday, December 3, 2010

नंगी थी, क्या चंगी थी !

नंगी थी, क्या चंगी थी
सारे जग में, चल पडी थी !

भाग रहे थे, सिमट रहे थे
खड़े खड़े सब, सूत रहे थे !

मिल गई थी, मिल रही थी
खूब मजे,सब लूट रहे थे !

रही थी, जा रही थी
लूट रहे थे, लुट रहे थे !

इधर चली, उधर चली
क्या गजब, मनचली थी !

नांच रही थी, नंगी थी
शीत लहर थी, चंगी थी !

नंगी थी, पर चंगी थी
क्या गजब की ठंडी थी !!!

7 comments:

मनोज कुमार said...

शब्दों का अजब समां बांधा है आपने।

संजय भास्कर said...

बहुत खूब, लाजबाब !
......... काबिलेतारीफ बेहतरीन

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

:)

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ईश्‍वर ने दुनिया कैसे बनाई?
उन्‍होंने मुझे तंत्र-मंत्र के द्वारा हज़ार बार मारा।

Rahul Singh said...

माया और ब्रह्म या कुछ उलटबांसी जैसा.

प्रवीण पाण्डेय said...

पर क्या?

मो सम कौन ? said...

जाकी रही भावना जैसी.....

Amrita Tanmay said...

शब्दों का सुन्दर ..ताल ,लय ,जिससे बहुत सुन्दर रचना ... बार-बार पढ़ना अच्छा लग रहा है ...बधाई