Wednesday, August 11, 2010

क्या मिला उनको बम फोड़ने से !

बोल बम बोल बम गूँज रहा था
बाहर कोई बेवजह बम फोड़ रहा था
मर गए दो-चार बम फूटने से
क्या मिला उनको बम फोड़ने से

अल्लाह-ओ-अकबर के नारे गूँज रहे थे
बाहर कोई बेवजह बम फोड़ रहा था
मर गए आठ-दस बम फूटने से
क्या मिला उनको बम फोड़ने से

जय माता दी, जय माता दी सब गा रहे थे
बाहर कोई बेवजह बम फोड़ रहा था
मर गए तीन-चार बम फूटने से
क्या मिला उनको बम फोड़ने से !

9 comments:

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी कविता।

ललित शर्मा said...

बेहतरीन उम्दा पोस्ट-अच्छा बम फ़ोड़े हैं दादा सुबह सुबह

आपकी ब्लॉग4वार्ता

चेतावनी-सावधान ब्लागर्स--अवश्य पढ़ें

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िआ!

Majaal said...

सारे पागल, और सारे बराबर!
'मजाल' ख़त्म होता दिखता नहीं बवाल ये!

arvind said...

जय माता दी, जय माता दी सब गा रहे थे
बाहर कोई बेवजह बम फोड़ रहा था
मर गए तीन-चार बम फूटने से
क्या मिला उनको बम फोड़ने से ! ....बहुत बढ़िआ

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

बढि़या बम.

बोल बम!

Shashank said...

जब व्यक्ति पर स्वार्थ हावी हो जाता है तो उसमे से इंसानियत ख़त्म हो जाती है, फिर चाहे वो राजनीती को लेकर हो या फिर धर्म को लेकर, फिर बम फोड़ने का काम हो या भाई को मरना, उसके लिए कोई मायने नहीं रखता ।
और आजकल तो सभी धर्मं के नाम पर व्यापार कर रहें हैं। btw कविता अच्छी लगी ज़नाब

ललित शर्मा-للت شرما said...

सार्थक लेखन के लिए शुभकामनायें


आपकी पोस्ट ब्लॉग4वार्ता पर-स्वागत है....
आतंक वाद कब तक झेलेगें हम