Friday, July 30, 2010

शेर


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अब अंधेरों को, गुफाओं की जरुरत है कहाँ
गरीबों के बसेरों में, अंधेरे ही अंधेरे हैं |

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8 comments:

arvind said...

vaah kyaa sher mara hai....

डॉ टी एस दराल said...

वाह , वाह , वाह ! बहुत खूब ।

कविता रावत said...

behad marmsparshi rachna

राज भाटिय़ा said...

बहुत खुब जी, जबाब नही. धन्यवाद

देवेश प्रताप said...

बहुत खूब ....

शहरोज़ said...

बहुत खूब

संजय भास्कर said...

वाह ! बहुत खूब ।

उठा पटक said...

bahut badhiyaa !