Tuesday, May 11, 2010

शेर

"कुछ तो हुनर रहा होगा

यूं ही मुकाम नही मिलते।"

कहीं से, फ़िर किसी के टूटने की चरचराहट है

चलो अच्छा हुआ, हम पत्थर- नुमा निकले ।

मजहबी दीवारें खुद-ब-खुद हिल रही हैं

पर कुछ मजहबी उन्हें पकडे हुये हैं ।

23 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत सटीक कहा!!




एक अपील:

विवादों को नजर अंदाज कर निस्वार्थ हिन्दी की सेवा करते रहें, यही समय की मांग है.

हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार में आपका योगदान अनुकरणीय है, साधुवाद एवं अनेक शुभकामनाएँ.

-समीर लाल ’समीर’

राजेन्द्र मीणा said...

बड़े भाई उस दिन आपकी बात बिलकुल सही थी ..हमने फोटो बदल कर तजा फोटो लगा ली ....आपने उस दिन सही ही कहा था ..पर तरीका थोड़ा सा हमें बुरा लगा तो ...हम बेवजह ही उबल गए .......परन्तु गौर से आपकी बात पर विचार किया तो हमें लगा आप की बात उचित थी .....बस अब इतना कहूँगा की अपने इस छोटे भाई को माफ़ कर दे ...और अपने विशाल हिरदय से मुझे माफ़ीदेने के तौर पर एक सुन्दर सी टिपण्णी भेजे ,,,,या ईमेल कर दे ताकि मेरे मन का मैल दूर हो और अपनी गलती को भुला सकूं ,,,,आपको फिर से सादर प्रणाम

राजेन्द्र मीणा said...

शेरो के बारे मैं यही कहूँगा की शेर ..की कलम से निकले शेर है .....

ललित शर्मा said...

वाह वाह वाह

ललित शर्मा said...

शेर तो शेर यह बब्बर शेर है
आभार

'उदय' said...

@राजेन्द्र मीणा
... अब लग रहा है अपना भाई "स्मार्ट" ... शाम को फ़ुर्सत के पलों में आता हूं आपके ब्लाग पर ...!!!

राम त्यागी said...

waise Rajendra u r looking smart in new photo ..sher sahi raha :)

देवेश प्रताप said...

बेहतरीन ....प्रस्तुती

दिलीप said...

waah bahut khoob...

राजकुमार सोनी said...

छा गए गुरू। काफी गंभीर बात।

राजकुमार सोनी said...

छा गए गुरू। काफी गंभीर बात।

राजकुमार सोनी said...

अपन तो भाई सर्वधर्म पर भरोसा रखने वाले हैं, इसलिए मजहबी लोगों की बहुत ज्यादा चिन्ता नहीं करते।

राजकुमार सोनी said...

अभी तो अंग्रेजी बाबू ज्ञानदत्त साहब की सेवा में लगा हुआ है जाने कहां जाकर छिप गए है श्रीमानजी

arvind said...

कहीं से, फ़िर किसी के टूटने की चरचराहट है

चलो अच्छा हुआ, हम पत्थर- नुमा निकले.
.....बेहतरीन ....सटीक...वाह वाह.

संजय भास्कर said...

........बहुत खूब, लाजबाब !

Babli said...

वाह ! बहुत बढ़िया! हर एक पंक्तियाँ प्रशंग्सनीय है! लाजवाब रचना!

vikas said...

बहुत श्रेष्ठ पक्तियां ...सन्देश से परिपूर्ण

विकास पाण्डेय
www.vicharokadarpan.blogspot.com

राज भाटिय़ा said...

अति सुंदर रचना के लिये धन्यवाद

दिगम्बर नासवा said...

Vaah Janaab ... ache sher hain sab .. parpahle waala sher kamaal ka hai ...

मनोज कुमार said...

चलो अच्छा हुआ, हम पत्थर- नुमा निकले ।
उम्दा सोच!

विनोद कुमार पांडेय said...

कम शब्दों में बेहतरीन भाव..सुंदर रचन के लिए बधाई

राजभाषा हिंदी said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।

kshama said...

कहीं से, फ़िर किसी के टूटने की चरचराहट है

चलो अच्छा हुआ, हम पत्थर- नुमा निकले ।

Kaash ham bhi aisa ban saken!