Saturday, February 10, 2018

किलेबंदी

अगर .. वो चमचे नहीं होते ...
तो ..
वो ...
साहब के गले के गमछे नहीं होते,

यही दस्तूर है
हुनर है

साहब ... यही किलेबंदी है ....
शह है ... मात है .... !!

- श्याम कोरी 'उदय'

3 comments:

Dhruv Singh said...

आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' १२ फरवरी २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

Jyoti Khare said...

वाह
बहुत खूब

shyam kori 'uday' said...

आभार ...