Sunday, September 29, 2013

भाजपा-कांग्रेस दोनों के सिर पर मंडराते संकट के बादल ?

भाजपा-कांग्रेस दोनों के सिर पर मंडराते संकट के बादल ! 

आज हम जिस दौर से गुजर रहे हैं वह राजनैतिक परिवर्तन का दौर है, व्यवस्था परिवर्तन का दौर है, सत्ता परिवर्तन का दौर है, विकास का दौर है, नई तकनीक का दौर है, नई उम्मीदों व नई आशाओं का दौर है ! लेकिन यह दौर, आज का दौर, हमारे सबसे बड़े राजनैतिक दलों कांग्रेस व भाजपा दोनों के लिए संकट का दौर है, संकट का दौर इसलिए कि देश की जनता निरंतर हो रहे भ्रष्टाचार व घोटालों से तंग आ चुकी है, इसलिए वह बदलाव चाहती है, व्यवस्था में परिवर्तन चाहती है, एक ऐसी व्यवस्था चाहती है, एक ऐसा सशक्त क़ानून चाहती है जो भ्रष्टाचारियों, घोटालेबाजों, बलात्कारियों व जघन्य हत्याओं के आरोपियों को कठोर दंड से दण्डित कर सके ! 

यदि हम केंद्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस की बात करें या सत्ता के विपक्ष में बैठी भाजपा की बात करें तो दोनों की सोच व विचारधारा में हमें ज्यादा अंतर नजर नहीं आता है, दोनों ही दल अपनी अपनी जगह पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता का सुख भोगने में मशगूल हैं, इनकी प्रजा अर्थात जनता किस हाल में है ? क्या चाहती है ? इससे दोनों को कोई लेना-देना है भी या नहीं, यह जाहिरा तौर पर कतई नजर नहीं आता है, यदि कहीं कुछ नजर आता है तो ये दोनों दल एक दूसरे को पटकनी देने की मुद्रा में हर क्षण भौंएँ ताने नजर आते हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसा प्रतीत होता है कि इनके जेहन में जनता के प्रति संवेदनशीलता एक तरह से मर सी गई है, यहाँ यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि इन्हें न तो जनता की चिंता है और न ही जनता के हितों की ! 

खैर, लेकिन, फिर भी, यहाँ यह चर्चा करना मैं जरुरी समझता हूँ कि यदि दोनों दल इसी तरह एक दूसरे की देखा-देखी दिखावटी कदम ताल करते रहे, एक दूसरे पर स्वार्थगत आरोप प्रत्यारोप लगाते रहे, अपने अपने व्यक्तिगत व राजनैतिक हित साधते रहे, तो वह दिन दूर नहीं जब कोई नया दल चमत्कारी ढंग से इन्हें पटकनी देकर सत्ता रूपी घोड़े में सवार हो जाए ! एक सवाल मेरे जेहन में बिजली की भाँती कौंध रहा है कि निरंतर गिरते जनाधार के बीच तथा नीति व दिशाविहीन गठबंधनों के सहारे यदि कांग्रेस आगे का सफ़र तय करना चाहती है तो कब तक ? कहाँ तक ? क्या कांग्रेस का थिंक टैंक पूरी तरह ध्वस्त हो गया है ? यह सवाल जरुर मेरे जेहन में कौंध रहा है, लेकिन मैं चाहता हूँ कि इस सवाल का जवाब स्वयं कांग्रेस ढूंढे !

वहीं दूसरी ओर मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि विगत कुछ वर्षों में निरन्तर हुए भ्रष्टाचार व घोटालों के कारण कांग्रेस के गिरते जनाधार की वजह से, या सहयोगी दलों की उठा-पटक से निर्मित हो रही दुर्दशा की वजह से, या व्यवस्था परिवर्तन व जनलोकपाल रूपी आन्दोलनों की वजह से निर्मित हालात को देखते व भांपते हुए भाजपा के ख्यालों में सत्ता रूपी ख्याली रसगुल्ले पकने शुरू हो गए हैं ! जबकि, जहाँ तक मेरा मानना है कि आज देश की जनता केंद्र में भाजपा को कांग्रेस के विकल्प के रूप में नहीं देख रही है, वो तो भ्रष्टाचार व घोटालों के कारण जनता के मन में कांग्रेस के प्रति जो आक्रोश व्याप्त हुआ है उसके कारण भाजपा थोड़े-बहुत बढ़त की मुद्रा में नजर आ रही है ! वर्ना, भाजपा में ऐसी कोई नई व भिन्न बात नहीं है जो उसे कांग्रेस से एक अलग पहचान दे ! 

देश के जनमानस को कांग्रेस व भाजपा की नीतियों, सोच व विचारधाराओं में कोई ज्यादा भिन्नता नजर नहीं आती है, यहाँ सवाल यह उठता है कि भिन्नता नजर आये भी तो आये कहाँ से, कैसे, क्यों ? जब दोनों ही दलों का रवैय्या भ्रष्टाचार व घोटालों के मुद्दों पर लगभग एक जैसा है, जाति व धर्म की वोट नीति पर एक जैसा है, आपराधिक व दागी स्वभाव के प्रतिनिधियों के सन्दर्भ में भी आचरण व् व्यवहार एक जैसा है, और तो और दोनों की चुनावी व नीतिगत कार्यशैलियों में भी कहीं कोई निष्पक्षता, पारदर्शिता, दूरदर्शिता नहीं है ! लगभग सभी पैमानों पर, मापदंडों पर, दोनों सगे व जुड़वा भाई से नजर आते हैं, भाजपा में कहीं कोई ऐसे अलग भाव नहीं हैं जो जनता को कांग्रेस से अलग नजर आयें !

इन उपरोक्त मुद्दों पर मैं कोई मनगढ़ंत बात नहीं कर रहा हूँ, और न ही मेरी कोई ऐसी मंसा है कि आंकलन में कोई भेद करूँ या कोई पक्षपात करूँ, और न ही मैं किसी का घोर विरोधी या समर्थक हूँ ! आप स्वयं देख सकते हैं व महसूस कर सकते हैं कि जो हाल भ्रष्टाचार व घोटालों के मुद्दे पर, निष्पक्षता व पारदर्शिता के मुद्दे पर, सशक्त लोकपाल व लोकायुक्त के मुद्दे पर, केंद्र में कांग्रेस गठबंधन सरकार का है लगभग वही हाल भाजपा शासित राज्यों में भाजपा का है ! यह कहना किसी भी दृष्टिकोण से अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि दोनों दल अपने अपने स्थान पर सत्ता का भरपूर मजा ले रहे हैं, और रही बात योजनाओं की, विकास की, जनता की, जनभावनाओं की, तो वह भगवान भरोसे है ! 

सीधे व स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो देश की जनता राजनैतिक नीतियों, सोच व विचारधारा के मामले में कांग्रेस व भाजपा दोनों से ऊब गई है, वही पुराने दावे, वही पुराने वादे, वही घिसी-पिटी बातें, कब तक ? कहाँ तक ? आज परिवर्तन का दौर है, विकास का दौर है, नई तकनीक का दौर है, जहां चारों ओर विकास व तकनीक की क्रान्ति छिड़ी हुई है वहां आज भी हमारी ये दोनों सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टियां जाति व धर्म से सम्बंधित वोट बैंक की राजनीति करने में मशगूल हैं ! इन परिस्थितियों में जनता का इनसे मोह हट जाना, इनके प्रति ऊब उत्पन्न हो जाना, कहीं कोई अचरज जैसी बात नहीं है, यहाँ यह कहते हुए मुझे ज़रा भी संकोच नहीं हो रहा है कि स्वयं इनकी कालगुजारियों की वजह से आज जनता तीसरे विकल्प की ओर अग्रसर हो रही है ! 

अब, आज वह दौर नहीं रहा जब छल व प्रपंच को राजनीति व कूटनीति का नाम देकर सत्ता में बने रहो या सत्ता हासिल कर लो, और न ही वह दौर रहा जब झूठे वादों और दावों के बल पर लम्बे समय तक तिकड़मी मंसूबों को साधे रहो, आज का दौर निसंदेह परिवर्तन का दौर है, विकास का दौर है, नई सोच व नई विचारधारा का दौर है, कुछ नया करने का व कर के दिखाने का दौर है ! अगर आज भी, इस दौर में भी, हमारे राजनैतिक दल इस सोच व विचारधारा के साथ चल रहे हैं कि वे जाति व धर्म के नाम पर, या झूठे दावों और वादों के नाम पर सत्ता हासिल कर लेंगे, या सत्ता में बने रहेंगे तो मेरा मानना तो यह है कि वे भ्रम में हैं और भ्रम से बाहर निकलना ही नहीं चाहते हैं, ऐसा प्रतीत होता है कि अब वे तब ही चेतेंगे जब इनका भ्रम स्वयं इनका घटता जनाधार तोड़ेगा !

यदि इन्हें इनकी वर्त्तमान वास्तविकता पे यकीन नहीं है तो ये अपने पिछले दस साल के ग्राफ को देखकर व विश्लेषण कर स्वयं ही अपनी आँखें खोल सकते हैं अर्थात अपनी स्थिति व निरंतर गिरते जनाधार को देख सकते हैं, भांप सकते हैं ! मेरा तो स्पष्ट तौर पर मानना है कि देश के दोनों बड़े राजनैतिक दल कांग्रेस व भाजपा इस तथ्य के जीते जागते उदाहरण हैं जो तीव्रगति से अर्श से फर्श की ओर जाते हुए दिखाई दे रहे हैं ! खैर, अपने को इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि कौन अर्श पे रहेगा और कौन फर्श पे, अपना अभिप्राय तो सिर्फ इतना है कि देश की सत्ता ऐसे लोगों के हांथों में रहे जो दागदार न हों, सजायाफ्ता न हों, छल व प्रपंच के उस्ताद न हों, झूठे दावों और झूठे वादों के खिलाड़ी न हों, अगर वो हों तो निष्पक्ष हों, पारदर्शी हों, साफ़-सुथरी छबी के हों, साफ़-सुथरे ख्यालों के हों, जिन पर देश का जनमानस गर्व कर सके !

अगर आज भी, अब भी, इन हालात में भी, ये दोनों दल अपने पुराने ढर्रे पर चलते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब स्वयं ये अपने अस्तित्व को ढूँढते गाँव-गाँव व शहर-शहर में नजर आयें, और इन्हें अपने अस्तित्व के अवशेष भी न मिलें ! खैर, ये हमारी समस्या नहीं है, अगर ये अपनी कार्यशैली, सोच, नीतियों व विचारधाराओं में बदलाव नहीं लाते हैं तो अपने अच्छे व बुरे के लिए ये स्वयं ही जिम्मेदार होंगे, किन्तु इस सन्दर्भ में मेरी व्यक्तिगत राय तो यही है कि अभी भी ज्यादा कुछ बिगड़ा नहीं है, गर समय रहते समय के अनुकूल ये दोनों दल अपनी नीतियों, सोच व विचारधाराओं में बदलाव ले आते हैं तो अभी भी एक सुनहरा कल इनकी राह तक रहा है, अन्यथा संकट के बादल तो सिर पे मंडरा ही रहे हैं ! वैसे भी 'विनाश काले विपरीत बुद्धि' वाली कहावत अपने आप में सिद्ध व चरितार्थ है जो सभी पर लागू होती है, जय हिन्द, जय लोकतंत्र !! 

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सबको ही नयी संभावनायें ढूँढ़नी होंगी। उन बाहुबलियों की निकल पड़ेगी जिनके ऊपर कोई केस नहीं है।

राकेश कौशिक said...

सार्थक, सामयिक एवं प्रेरक प्रस्तुति
जय हिन्द, जय लोकतंत्र!