Saturday, September 28, 2013

दावों बनाम वादों की राजनीति ?

दावों बनाम वादों की राजनीति ! 

भारत दुनिया का एक विशालतम लोकतंत्र है किन्तु आज यह भ्रष्टाचार व घोटाले रूपी जिस जघन्य दौर से गुजर रहा है उसे देखकर व उसके बारे में सोचकर अन्दर ही अन्दर एक अजीब तरह की खीज व तिलमिलाहट शुरू हो जाती है, सरल शब्दों में कहा जाए तो खून उद्धेलित होने लगता है, मन आक्रोशित होने लगता है, ऐसे में एक सवाल उठता है कि आखिर ये हालात बने कैसे ? कौन है इन हालात के लिए जिम्मेदार ? इन प्रश्नों के उत्तर उतने भी कठिन नहीं हैं कि आम सोच व समझ का व्यक्ति भी न समझ सके !

जहाँ तक मेरा मानना है या सीधे शब्दों में कहा जाए तो इन हालात के लिए प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से वर्त्तमान राजनीति की सोच, विचारधारा व नीतियाँ जिम्मेदार हैं लेकिन इस कड़वे सच को मानने के लिए कोई तैयार नहीं है, जब हम इस विषय पर चर्चा करेंगे या करते हैं तो तमाम राजनैतिक व बुद्धिजीवी लोग अपने मनगढ़ंत तर्कों से खींच-तान कर इन हालात के लिए आम जनमानस को ही जिम्मेदार ठहरा देते हैं तथा यह कहकर पल्ला झाड लेते हैं कि जनता ही तो अपने प्रतिनिधि चुन रही है !  

वैसे, इसमें दोराय नहीं है कि देश का अवाम ही अपने राजनैतिक प्रतिनिधियों का चयन कर रहा है लेकिन फिर भी देश के अवाम अर्थात जनमत को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा क्योंकि वह अपने प्रतिनिधियों को यह सोचकर चुन कर विधानसभा या लोकसभा में नहीं भेजता है कि वह वहां जाकर अपनी मनमानी करने लगें, भ्रष्टाचार व घोटाले करने लगे, वे देश व क्षेत्र का नाम गौरवान्वित करना छोड़कर अपने निजी स्वार्थों की पूर्ती के लिए देश व क्षेत्र को कलंकित करने लगें ? साथ ही साथ अवाम के सामने वही घिसे-पिटे एक दो विकल्पों के अलावा कोई और विकल्प भी तो नहीं होते हैं ?

खैर, इस विषय पर अगर हम गहन चर्चा में कूद पड़ेंगे तो शायद अपने मूल विषय से भटक जाएँ, वैसे अपने मूल विषय 'दावों बनाम वादों की राजनीति' के जन्मदाता ये हालात ही हैं, अभिप्राय यह है कि वर्त्तमान राजनीति के केंद्रबिंदु 'दावे' और 'वादे' ही हैं, स्पष्ट शब्दों में कहा जाए तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने 'दावों और वादों' को चुनाव जीतने के लिए अपना मूल हथियार बना लिया है, दोनों ही पक्ष ठीक चुनाव के पूर्व अपने अपने दावे व वादे रूपी हथियारों को प्रभावशाली व आकर्षक ढंग से प्रयोग में लाते हैं तथा अपने अपने चुनावी मंसूबों को साध लेते हैं।  

आपके जेहन में यह प्रश्न कौंधना स्वाभाविक है कि राजनैतिक दल 'दावों और वादों' को अपना हथियार कैसे बना लेते हैं ? इसका सीधा सा उत्तर यह है कि सत्ता में बैठा राजनैतिक दल ठीक चुनाव के पूर्व यह 'दावा' करने में लग जाता है कि उसने अपने कार्यकाल के दौरान इतनी सडकों, पुलों, ओवरब्रिजों, भवनों, जिलों, तहसीलों, थानों, इत्यादि का निर्माण कराया, रोजगार के हजारों-लाखों अवसर उपलब्ध कराये, किसानों के हित में ये किया वो किया, बगैरह बगैरह ऐसे दावे होते हैं जिन्हें वे चुनावी हथियार के रूप में प्रयोग में लाते हैं। 

ठीक इसके विपरीत विपक्ष में बैठा राजनैतिक दल भी कम होशियार नहीं होता है वह 'वादों' को अपना चुनावी हथियार बना कर प्रयोग में लाता है वह कदम कदम पर वादों की झड़ी लगाते रहता है, कदम कदम पर यह दम ठोकते रहता है कि चुनाव जीतकर आने पर वह किसानों के ऋण माफ़ कर देगा, व्यापारियों को टैक्स में छूट देगा, फलां फलां जाति को आरक्षण देगा, रोजगार के भिन्न भिन्न अवसर प्रदान करेगा, ये निर्माण करेगा वो निर्माण करेगा, यहां ये करेगा वहां वो करेगा, इस तरह के तमाम वादों की झड़ी लगा लगाकर चुनावी मैदान जीतने के प्रयास में लग जाता है।  

अब यहाँ सवाल ये है कि दोनों के दावे और वादे व्यवहारिकता में कितने सही हैं ? कितने खरे हैं ? कितने खरे उतरेंगे ? इस सच्चाई को जानने व समझने का समय आम जनमानस के पास होता कहाँ है वह तो सुबह से शाम तक अपने दैनिक क्रियाकलापों में उलझा रहता है, अपनी व अपने परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए खटते रहता है, भटकते रहता है, आम आदमी की रोजमर्रा की इस आपा-धापी के बीच चुनाव कब आते हैं और कब गुजर जाते हैं, यह भी अपने आप में एक पहेली से कम नहीं है।

खैर, इन सब के बीच दावे और वादे रूपी चुनावी हथियार चलते रहते हैं, आम आदमी अपनी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने में उलझा रहता है, लोग चुनाव हारते व जीतते रहते हैं, सरकारें बनते व बिगड़ते रहती हैं, कितने दावे सही हैं, कितने वादे पूरे होंगे या हुए हैं, यह सिलसिला चलते रहता है। और, अगर, यदि कोई दावों और वादों की तह में जाने की कोशिश करता है तो उसकी आवाज कुछ दूर जाकर ही लुप्त हो जाती है, दावों और वादों की राजनीति के दौर में उठी हुई आवाज थककर स्वत: लुप्त हुई या लुप्त कर दी गई ? एक ओर यह सवाल लोगों के जेहन में गुजरते वक्त के साथ गुजरते रहता है तो दूसरी ओर दावों और वादों की राजनीति फलते फूलते रहती है !

2 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

वादे बड़े, प्रस्तुति छोटी..

ई. प्रदीप कुमार साहनी said...

दमदार समसामयिक आलेख |

मेरी नई रचना :- जख्मों का हिसाब (दर्द भरी हास्य कविता)