Sunday, August 25, 2013

नाकारा हुक्मरान ...

सच ! अब 'खुदा' ही जाने 'उदय', कितने 'खुदा' हैं वतन में
आज जिसे देखो वही लगा है 'खुदा' कहलाने के जतन में ?

वो बड़े जालिम हैं इस तरह पीछा न छोड़ेंगे
फिर किसी मोड़ पे बेशर्म से मिल जायेंगे ?

हाँ, शक है हमें, ........... तेरी खुबसूरती पे
चेहरा तेरा, पहले कहीं देखा सा लगता है ?

गर, ........................... सिर कटेंगे तो कट जाने दो
पर किसी नाकारा हुक्मरान के आगे न झुकेंगे हम ?

सच ! साकी ने मुस्कुरा के हमें प्याला थमा दिया
अमृत समझ के पी गए, हम प्याला जहर भरा ?

6 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ख़ूब

तुषार राज रस्तोगी said...

आपकी यह पोस्ट आज के (२६ अगस्त, २०१३) ब्लॉग बुलेटिन - आया आया फटफटिया बुलेटिन आया पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

Rajesh Kumari said...

आपकी इस उत्कृष्ट रचना की चर्चा कल मंगलवार २७ /८ /१३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका हार्दिक स्वागत है।

प्रतिभा सक्सेना said...

हाँ, जितना टालो उतना ही सिर पर चढ़े आते हैं ये लोग !

Pratibha Verma said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।

रश्मि शर्मा said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।