Thursday, June 27, 2013

वाह-वाही ...

सच ! वो दर्द लेकर तो खुद ही गये हैं यहाँ से
फिर भी, गुमान है उन्हें अपनी होशियारी पे ?
...
जाने दो ...
उनकी तरह, जिन्दगी बे-वफ़ा नहीं होगी ?
...
इंकलाब .............................................................
......................................................... जिन्दाबाद !
...
हम तो बस, एक लाइन के नीचे दूसरी लाइन खींचने भर के 'शेर' हैं
यहाँ तो लोग हैं,..................... जो खुद को पूरा जंगल समझते हैं ?
...
सच ! वाह-वाही लूटने का, बड़ा अच्छा तरीका ढूंढा है उन्ने
किसी की वाल के शब्दों को, अपनी वाल पे अपना कह दो ?
...

4 comments:

Kailash Sharma said...

सच कहा है...लेकिन क्या कर सकते हैं जब उन्हें कोई शर्म ही नहीं..

Madan Mohan Saxena said...

वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
http://madan-saxena.blogspot.in/
http://mmsaxena.blogspot.in/
http://madanmohansaxena.blogspot.in/
http://mmsaxena69.blogspot.in/

के. सी. मईड़ा said...

ऐसा लगता है जैसे जनाब बेवफा फेसबुक के मारे है

के. सी. मईड़ा said...
This comment has been removed by the author.