Friday, June 21, 2013

अहमियत ...


उफ़ ! उनका फोन भी, उनकी ही तरह आशिक मिजाज निकला
सुबह देखो, ......... शाम देखो, .......... कभी खाली नहीं मिलता ?
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हजारों साँसें थम गईं, लोग जलमग्न हो गये
न जाने कितने,....................तनहा हो गये ?
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उफ़ ! आदमी को आदमी खाने लगा है 
अहमियत अब क्या रही सरकार की ? 
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सच ! वो खुद की अर्थी खुद सजा रहे हैं 
ऐंसे दमदार नेता रोज नजर आ रहे हैं ? 
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हाय-तौबा तो ... उनकी, हमारी, सब की, रोज की आदत है 
कुदरती कहर था .......................... इसे अब मान भी लो ?
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