Wednesday, October 24, 2012

सत्ता की डोर ...

भाईयों ... सुनो ... चलो ...
रावण को मारेंगे ...
नहीं ... नहीं ... नहीं ...
मत मारो ... रावण को !

क्यों ? किसलिये ??
क्योंकि -
आज,
उसके हाँथों में सत्ता की डोर है !

तो ... रहने दो ... क्या हुआ ?
नहीं ... ज़रा सोचो ...
उसके मरते ही,
डोर ... छूट जायेगी हाँथों से ...
और हम ...
दिशाहीन ... हो जायेंगे !

तो फिर ... ये भ्रष्टाचार ??
भ्रष्टाचार ...
होने दो ... रहने दो ... बढ़ने दो ...
पर, रावण को ...
ज़िंदा ... रहने दो ... !

रहने दो ... होने दो ... भ्रष्टाचार ...
ज़िंदा ... रहने दो ... रावण को
कहीं,
सत्ता की डोर ...
छूट न जाए ... उसके हाँथों से !!

1 comment:

Manu Tyagi said...

सुंदर रचना