Wednesday, September 12, 2012

फरमान ...

क्यूँ मियाँ, क्या हुआ, जो रो दिये 
आईने में खुद को ही देख कर ??
... 
'यम' आया, बगैर बोले-सुने, उठा के ले गया 
उनकी तमाम दौलतें, धरी-की-धरी रह गईं ? 
... 
रंगों से खेलता, सिर्फ काले से क्यों 
लो, अब सरकार नाराज हो गई ? 
... 
किसी को आईना, मत दिखाओ 'उदय' 
गर वो रूठा, तो कैद मुमकिन समझो ? 
... 
ये भी खूब रही, उन्हें माफी और हमें सजा 
ये फरमान है, या है चमड़े का सिक्का ??

4 comments:

yashoda agrawal said...

आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 15/09/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

"पलाश" said...

achchha lga padh kr.
aabhaar

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बेहतरीन लिखे हैं सर!

सादर

Onkar said...

सुन्दर रचना